विचार कभी सामान्य नहीं होते

विचार तो मन में आते हैं लेकिन हम उन्हें सही दिशा नहीं दे पाते। अपनी आंखों के सामने हर पल कुछ नया देखते हैं लेकिन उसके बारे में सोच नहीं पाते, अगर सोचते हैं तो शब्दों में ढ़ालना मुश्किल है। शब्दों में ढ़ाल भी दें तो उसे मंच देना और भी मुश्किल है। यहां कुछ ऐसे ही विचार जो जरा हटकर हैं, जो देखने में सामान्य हैं लेकिन उनमें एक गहराई छिपी होती है। ऐसे पल जिन पर कई बार हमारी नजर ही नहीं जाती। अपने दिमाग में हर पल आने वाले ऐसे भिन्न विचारों को लेकर पेश है मेरा और आपका यह ब्लॉग....

आपका आकांक्षी....
आफताब अजमत



Sunday, December 30, 2012

कैसे रुकेगा बलात्कार


बलात्कार, दामिनी, बदनसीब...न जाने कितने शब्दों की संज्ञा दे रहे हैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले। बड़े-बड़े विद्वानों को स्टूडियो में बैठाकर लंबी-लंबी बहस। कोई उस बहादुर लड़की को चिरैया की उपाधि दे रहा है तो कोई देश को शर्म से सर झुकने की बात चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है। निचोड़ एक है, महिलाओं की सुरक्षा और समाज में उनका मान। इस मान के लिए हालांकि लड़ाई लंबी रही है लेकिन एक छोटी सी बात ही यहां रोड़ा बन जाती है।

बात होती है बाजार की। महिला आज के समय में बाजार की सबसे बड़ी मांग है। उसका जिस्म ही उत्पादों के बेचने का रास्ता तय करता है। बड़े-बड़े कारपोरेट घराने, जिनमें भारतीय भी शामिल हैं, महिलाओं के जिस्म की नुमाइश के आधार पर अपनी बैलेंस शीट तैयार करते हैं। इस नुमाइश में कहीं से भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कम नहीं है। दो मिनट के लिए यहां दामिनी के साथ हुए अत्याचार को बेहद शाब्दिक लहजे में पेश किया जाता है तो अगले ही पल आने वाले ब्रेक में उसी दामिनी के कपड़े उतरते हुए अर्धनग्न हालत में जिस्म की नुमाइश करते हुए दिखाया जाता है। कल रात अचानक न्यूज चैनल देखते हुए यह विचार बरबस ही मन को बेचैन कर गया। जैसे ही चैनल ने ब्रेक की घोषणा की तो अगले दो पलों में एक फर्श का विज्ञापन अर्श तक महिलाओं के जिस्म की नुमाइश करता नजर आया। नुमाइश भी इस कदर कि खुली हुई टांगे दिखाकर एक फर्श को बेहतर साबित करने की होड़। क्या कर रहे हैं हम, क्या दिखा रहे हैं और महिला को क्या सम्मान दे रहे हैं???

इन सवालों को जवाब तलाशने निकलों तो शायद पूरा युग बीत जाएगा। महिला आज भी हमारे समाज ही नहीं बाजार के लिए भी महज एक उत्पाद विक्रेता है। जिसके जिस्म को हम जितना बेहतर तरीके से जनता के सामने पेश कर देंगे, वह उतना ही उनके मन में उतर जाएगा।

सवाल आपके लिए छोड़ रहा हंू, आखिर क्या इस तरह से हम महिलाओं को सम्मान दिला पाएंगे? उनकी लुटती हुई आबरू को समाज का इज्जत वाला लबादा ओढ़ा पाएंगे?

Friday, December 28, 2012

आओ मिलें भारत के बेतुके लोगों से

भारत आजाद कराने के लिए गांधी जी ने जितनी जद्दोजहद यानी आंदोलन और समर्पण किया, एक भारत देश का सपना देखा लेकिन हे गांधी(हे भगवान स्टाइल) तेरे देश के नेताओं और बुद्धिजीवी वर्ग को ये क्या हो गया? जनता के वोट के लालच में इस कदर अंधे हो गए कि दो पल में वह अपना ऊपर से नियंत्रण खो देते हैं. यह नियंत्रण खोना तो ठीक भी कहा जाए लेकिन इससे कितने लोगों यानी उनके वोट बैंक की भावनाओं को ठेस पहुंचती है, ये तो इन लोगों के बयान की गहराई से आप भी समझ सकते हैं....

बेतुका भाषण संख्या 1-
आंध्र प्रदेश में मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन पार्टी के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना मुंबई अटैक में फांसी पर चढ़ाए गए अजमल कसाब से कर दी। मोदी पर निशाना साधते हुए ओवैसी ने कहा, 'उस बच्चे अजमल कसाब को फांसी पर लटका दिया गया, ठीक किया। उसने दो सौ बेकसूर लोगों की जान ली थी। लेकिन, गुजरात में दो हजार मुसलमानों की हत्या के गुनहगार नरेंद्र मोदी को फांसी क्यों नहीं दी?Ó अपने भाषण में ओवैसी ने आगे कहा, 'पाकिस्तानी है तो हिंदुस्तानी को मारने पर फांसी। हिंदुस्तानी है तो हिंदुस्तानी को मारने पर देश की गद्दी... अगर देश में इंसाफ है तो कसाब की तरह मोदी को भी ऐसी सजा दी जाए।Ó

बेतुका भाषण संख्या 2-
सीपीएम के नेता अनीसउर्रहमान ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री से पूछा है कि यदि कोई उनका बलात्कार कर दे तो वे कितना मुआवजा लेंगी? अनीसुर्रहमान ने कहा, 'सरकार कहती है कि वो लड़कियों, किसानों और गरीबों सबका ख्याल रखती है। तो लड़कियों का ख्लाय किस तरह रखा जा रहा है, रोज लड़कियों से बलात्कार किया जा रहा है। ममता बनर्जी बलात्कार पीडि़तों से अपने घर को सजा रही हैं। जब हम सत्ता में थे तब ममता बनर्जी बलात्कार पीडि़तों को लेकर रॉयटर्स बिल्डिंग आती थीं और न्याय मांगती थी। तब हम कहते थे कि इन लड़कियों से काम नहीं चलेगा, किसी और अच्छी लड़की को लाओ, असल में खुद को ही ले आओ, तुम लोगों के बीच जाकर कह सकती हो कि मेरा बलात्कार हुआ है। मैं दीदी से पूछता हूं कि वो बलात्कार पीडि़तों को 20 हजार रुपये का मुआवजा दे रहीं हैं। लेकिन वो खुद कितना मुआवजा लेंगी। यदि कोई उनका बलात्कार कर दे तो फिर मुआवजा कितना होगा?Ó

बेतुका भाषण संख्या 3-
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का कहना है कि नैतिक मूल्यों के पतन के चलते महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं और इसकी वजह से दिल्ली में रेप जैसी वारदात होती हैं। दिल्ली से छपने वाले मेल टुडे टैब्लॉइड के मुताबिक, मोहन भागवत ने उज्जैन संभाग के शाजापुर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ गौ-अभयारण्य की आधाराशिला रखे जाने के मौके पर उन्होंने कहा, 'घर में गाय पालने से लोगों में नैतिक मूल्य बढ़ेंगे। गाय हमारी माता है। गाय की सेवा मानव जाति की सेवा के समान है। इससे हमारे भीतर सेवा की भावना जगेगी और नैतिकता बढ़ेगी।Ó रेप को लेकर देश में जहां गंभीर बहस हो रही है, ऐसे में संघ प्रमुख का बेतुका बयान समझ से परे है। इससे पहले हरियाणा में बढ़ते रेप के मामले पर खाप ने कहा था कि राज्य में बलात्कार जैसे अपराध इसलिए बढ़ रहे हैं, क्योंकि लोग चाउमिन खा रहे हैं। इस बयान में कहा गया था कि चाउमिन खाने पर युवकों का हॉर्मोंन बढ़ रहा है, जिसके कारण वह रेप करने के लिए उत्तेजित हो जाते हैं।

बेतुका बयान संख्या 4-
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के पुत्र और जंगीपुर से कांग्रेस के सांसद अभिजीत मुखर्जी ने गैंग रेप के खिलाफ दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शन को लेकर एक विवादित बयान दे दिया है। उन्होंने कहा कि हर मुद्दे पर कैंडल मार्च करने का फैशन चल पड़ा है। अभिजीत ने कहा कि लड़कियां दिन में सज-धज कर कैंडल मार्च निकालती हैं और रात में डिस्को जाती हैं।

बेतुका बयान संख्या 5-
संजय निरुपम ने स्मृति पर निजी हमले करने शुरू कर दिए। उन्होंने कहा, 'स्मृति आप मुझे मेरा अतीत याद दिला रही हैं, लेकिन आप क्या थीं? आप तो पैसों के लिए टीवी पर ठुमके लगाती थीं और आज राजनीतिक विश्लेषक बन गईं।Ó न्यूज़ चैनल के एंकर ने निरुपम को निजी हमले करने से रोका, स्मृति ने भी उनकी बातों पर ऐतराज जताया। जब संजय निरुपम नहीं रुके तो स्मृति ने कहा,' कांग्रेस सांसद छिछोरेबाजी पर उतर आए हैं। निरुपम और उन बदमाशों में कोई अंतर नहीं जो दिल्ली की सड़कों पर छेड़छाड़ और बलात्कार करते हैं।Ó

बेतुका बयान संख्या 6-
राजस्थान में ही दलित समाज के सम्मेलन में राज्यसभा की पूर्व सदस्य जमनादेवी बारुपाल ने लड़कियों को पूरी तरह ढंके रहने की नसीहत दे डाली। उन्होंने यहां तक कहा कि कम कपड़े पहनने से लड़कियों की तरफ पुरुष आकर्षित होते हैं। इसमें पुरुषों का क्या दोष है।

बेतुका बयान संख्या 7-
पुलिस विभाग के खरगोन में सेमिनार में पहुंची महिला कृषि वैज्ञानिक ने महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता विषय पर बोलते हुए पीडि़ता को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। उन्होंने कहा- महिलाएं ही पुरुष को उकसाती हैं। डॉ. शुक्ला यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने और भी सवाल उठाए। उनका सवाल था 10 बजे रात को लड़की घर से बाहर क्या कर रही थी? फिर कहा- ब्वॉय फ्रेंड के साथ रात को बाहर निकलेगी तो यही होगा। पुलिस कहां तक संरक्षण देगी। उन्होंने पीडि़ता के प्रतिरोध को भी उसका दुस्साहस बता दिया। उनका कहना था हाथ पांव में दम नहीं, हम किसी से कम नहीं। छह लोगों से घिरने पर लड़की ने चुपचाप समर्पण क्यों नहीं कर दिया। कम से कम आंते निकालने की नौबत तो नहीं आती।

महोदय, आप भी आजाद भारत के आजाद परिंदे हैं। इन महानुभावों के बेतुके बयानों पर आप भी बेतुकी राय दे सकते हैं।

Thursday, December 27, 2012

सांप्रदायिक सौहार्द के दुश्मन थे अंग्रेज

अंग्रेजों ने हमारे मुल्क को सबकुछ दिया। सोने की चिडिय़ा को कंगालों की फौज में तब्दील करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इन सबके बीच सबसे अहम बात है, कि अंग्रेजों ने एक ऐसा दर्द हमेशा के लिए दे दिया, जिसकी दवा कोई नहीं। शायराना अंदाज में कहते हैं न कि दर्द भी ऐसा दिया, जिसकी दवा कोई नहीं। यह दर्द है सांप्रदायिकता का दर्द। इतिहासकारों ने इसमें अहम रोल प्ले किया है। इतिहास ने हमेशा से ही ऐसे तथ्यों को वरीयता दी जो कि सांप्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं। जबकि ऐसे तथ्य हमेशा के लिए गायब कर दिए, जो कि हमारे देश को एकता के सूत्र में पिरोते हैं।

मैं भी इस मामले में प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मरकडेय काटजू के विचारों से सहमत हंू। एक कार्यक्रम में उन्होंने भारतीय इतिहास पर सवाल उठाते हुए कहा है कि 'भारतीय इतिहासकार अंग्रेजों की बात को ही आगे बढ़ा रहे हैं, जिन्होंने इतिहास में हिंदू और मुस्लिमों को लड़ाने की बातें लिखीं।' उन्होंने यह भी कह दिया कि देश में हिंदू और मुसलमान 1857 तक धर्मनिरपेक्ष थे लेकिन गलत इतिहास के कारण अब उनमें से 80 फीसद सांप्रदायिक हैं। सांप्रदायिकता के लिए उन्होंने नेताओं को भी जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा, अंग्रेजों ने उन बातों का जिक्र इतिहास में दर्ज नहीं किया, जिससे देश में सौहार्द का माहौल बनता। तर्क दिए कि इतिहास की किताबों में बताया जाता है कि महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर तोड़ा जबकि उनके बाद पीढ़ी ने धर्मनिरपेक्ष होकर मंदिर बनाने को जमीन दान दी। नवाब अवध होली खेलते थे और ईद में उनके यहां हिंदू जाया करते थे। टीपू सुल्तान 156 मंदिरों को सालाना अनुदान दिया करते थे। ये सभी बातें इतिहास की किताबों से नदारद हैं और उन्हें कभी बताने की कोशिश भी नहीं हुई।

सांप्रदायिकता के इस मामले पर आज कॉलेज के दिनों की गुरुजी की सुनाई हुई चंद पंक्तियंा भी याद आ रही हैं....

कहीं मंदिर बना बैठे, कहीं मस्जिद बना बैठे
अरे, तुमसे तो अच्छी है उन परिंदों की जात
जो कभी मंदिर पे जा बैठे, कभी मस्जिद पे जा बैठे।।

Sunday, December 23, 2012

औरतों को कहां मिला हक

औरत, तेरी यही कहानी...आज फिर वो शब्द याद आ गए। मामला जब औरत की आजादी का आता है तो कई तरह की प्रतिक्रियाएं आम हैं। कोई इसे धार्मिक तौर पर देखता है तो कोई सामाजिक तौर पर। कोई बड़ी महिला हस्तियों का वास्ता देकर इस सच्चाई से मुंह चुरा लेता है तो कोई इस पर शून्य भाव दिखाकर उदासीन नजर आता है। आखिर औरत को हमने आजादी दी है या नहीं। क्या औरत आज भी जिंदगी और समाज के बोझ उठा रही है, झेल रही है उस पुरुष मानसिकता को, जिसमें केवल पुरुष का ही वर्चस्व कायम रहा है। ऐसे तमाम सवाल एक शख्सियत से बातचीत के दौरान कायम हुए हैं, जिन पर आज आपको भी बहस करने की जरूरत है।

महिला, हक और जरूरत। तीनों एक दूसरे के पूरक हैं। हर किसी ने महिला पर अपना हक और अपनी जरूरत तो जरूर पूरी की लेकिन कभी उसे उसका हक देने का वादा पूरा नहीं किया। कई अक्खड़ किस्म के लोग महिला को नौकरियों में आरक्षण, राजनीति में आरक्षण के बहाने अपनी जय जयकार में विश्वास करते हैं। धार्मिक नजरिए से भी इस्लाम में पर्देदारी को गलत करार दिया जाता है। हिंदू धर्म में भी तो परदा होता है। एक महिला अगर बाहर निकलती है तो उसकी कामयाबी को किस नजरिए से देखा जाता है, उसे सब जानते हैं। महिला आज भी गुलाम है। गुलाम, वर्चस्व वाले पुरुष समाज की, गुलाम धार्मिक रीतियों का रोना रोने वालों की, गुलाम हम सबकी...कभी किसी ने यह नहीं सोचा कि हमने महिलाओं को आजादी कितनी दी है। हम उन्हें अपने से ऊपर की पोस्ट तो दे सकते हैं लेकिन इस पोस्ट पर पहुंचने के बाद उन्हें क्या झेलना पड़ता है, कहना मुश्किल है। एक महिला अधिकारी इन दिनों काफी हतप्रभ हैं। उनकी चिंता इस बात को लेकर है कि उनका वरिष्ठ उन पर गलत निगाह डालता है। अब बताइए, इस महिला को हमने हक दिया आगे बढऩे का लेकिन अपनी सोच को और भी संकीर्ण बना लिया। अरे इसे आजादी कैसे कहेंगे, जब हम ऊपर पोस्ट तक लाने के बावजूद महिला पर अपनी आंखे तरेरना बंद ही नहीं करते।

अब वक्त आ गया है कि हम भी महिलाओं को उनका सही हक दिलाएं। अब यहां सही हक की क्या परिभाषा है, यह सबका अपना सोचने का अंदाज हो सकता है। लेकिन सही बात तो यह है कि जब हम अपनी पुरुषवादी संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर उन्हें हक दिलाएंगे तो वो महिलाओं का सच्चा हक होगा। इस मौके पर फैज अहमद फैज की कुछ अशआर याद आ रहे हैं....

बोल के लब आजाद हैं तेरे
बोल जबान अब तक तेरी है
तेरा सुतावन जिस्म है तेरा
बोल के जन अब तक तेरी है
बोल के सच जिंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले

सोच बदलनी होगी

रेप, गैंगरेप, कुकर्म और न जाने कितने घृणित करने वाले शब्द इस साल के आखिरी महीने के अखबारों और न्यूज चैनलों में इतिहास के साथ सिमट गए। एक मासूम के साथ हुई इस अनहोनी, अनहोनी नहीं बर्बरता को सुनकर, पढ़कर और इससे उपजे आंदोलन को देखकर हर उदासीन किस्म के इंसान की भी भावनाएं जागृत होने लगी हैं। हर कोई इंसाफ चाहता है, कानून बदलकर इन आरोपियों को फांसी तक पहुंचते देखना चाहता है। हर किसी को अपनी बहू-बेटियों की फिक्र है। सरकार और कानून अपना काम करता रहेगा लेकिन कुछ अहम बातें हमें अभी से अपनी जिंदगी के कानून की किताब में शामिल करनी होंगी।

-हमारे घर में दो बच्चे होते हैं, एक लड़का और एक लड़की। दोनों में से लड़की जब बड़ी होती है तो उसे पर्देदारी सिखाई जाती है, अनजान के सामने बात करने का सलीका सिखाया जाता है, गैर मर्दों से दूर होने का तरीका सिखाया जाता है लेकिन कभी भी कोई बेटे को तहजीब सिखाने की जुर्रत नहीं करता। उसे यह नहीं बताता कि बाहर सड़क से गुजरने वाली लड़की उसकी बहन के समान है। एक लड़की की फिलिंग्स के बारे में नहीं बताया जाता। हमें यह आज से ही शुरू करना होगा। तब शायद हमारी बहू-बेटियां ज्यादा सुरक्षित हो सकेंगी।

-हम लगातार महिलाओं को आजादी की बात करते हैं। उनकी आजादी के इस ढ़ोंग में ही अपनी जीत समझते हैं लेकिन अभी तक हम उन्हें अपनी सोच से आजाद नहीं कर पाए हैं। उनके भोग की वस्तु समझने की सोच, उन पर बुरी नजर डालने की सोच। हमें सबसे पहले महिलाओं को अपनी इस संकीर्ण सोच भी भी आजाद करना होगा।

-कई महिला मित्रों का तर्क है कि दुनिया में महिला होकर पैदा होना ही सबसे बड़ी चुनौती होती है। दिल्ली गैंगरेप के बाद से यह बात और भी पुख्ता हो गई है। कभी आप खुद को एक महिला के तौर पर समझकर देखेंगे तो पता चलेगा कि सड़क पर हर दिन महिला के लिए एक चुनौती होती है। ऐसी चुनौती, जिसका सामना शायद मर्द जात एक पल भी न कर पाए। तो उसे यह चुनौती देने वाले भी तो हम ही हैं।

-अंत में एक बार फिर मेरी सभी युवा भाई-बहनों से अपील है कि गैंगरेप के कानून में बदलाव की मांग को लेकर कानून को अपने हाथ में न लें। सरकारी संपत्ति भी हमारी सबकी संपत्ति है। राष्ट्रपति भवन हमारी शान है। यह मायने नहीं रखता कि उसमें मौजूद शख्स कौन है लेकिन यह मायने तो रखता है कि हम कहां पथराव कर रहे हैं। वैसे भी हिंसा किसी बात का हल नहीं है। कृप्या हिंसा को बढ़ावा न दें।

धन्यवाद

Friday, April 13, 2012

बाबा का क्या कसूर???

निर्मल बाबा, इन दिनों सबके दिलो दिमाग में पर छाए हुए हैं। कल तक उनके प्रशंसक उनका गुणगान करने वाले आज उनके आलोचकों की फेहरिस्त में आ गए हैं। कई जगहों पर निर्मल बाबा के खिलाफ मुकदमेबाजी का दौर भी चल पड़ा है। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर भी बाबा अब गुस्सैल यूजर्स के निशाने पर हैं। कल तक सबकुछ बेहतर लगने वाला आज अचानक कैसे बदल गया। कल तक जनता के दुखों का निवारण करने वाले बाबा अब खुद ही धर्मसंकट में फंस गए हैं। न्यूज चैनलों ने भले ही खबरों को दबाने का प्रयास किया हो लेकिन कहीं न कहीं बाबा की मुखालफत सामने आ ही रही है। बाबा....बाबा...आखिर कौन हैं निर्मल बाबा? कैसे मिला उन्हें यह चमत्कारी गुण और कैसे कर देते हैं वह जनता के दुखों का निवारण। ऐसे तमाम सवालों के बीच अगर निर्मल बाबा का दूसरा पक्ष देखा जाए तो कई नए एंगल नजर आते हैं। आखिर कभी हमने यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि निर्मल बाबा का उदय क्यों हुआ? इतने कम समय में वह हमारे घर-द्वार तक कैसे पहुंचे गए...

दरअसल निर्मल बाबा भी एक आम इंसान की तरह जिंदगी जीते थे। वह भी दुख और कर्ज का सामना कर चुके हैं। उन्हें भी कारोबार में घाटा उठाना पड़ा था लेकिन उन्होंने कभी किसी बाबा की शरण नहीं ली। क्योंकि वह जानते थे कि दुनिया का कोई भी शख्स उनके दुखों का निवारण नहीं कर सकता। अगर वह किसी बाबा के पास चले गए होते तो आज निर्मल बाबा ही न होते। खैर, निर्मल बाबा ने एक बात तो जान ही ली थी कि भारत की जनता कितनी अंध विश्वासी है। अगर माइंड गेम खेलकर उनके दिलो दिमाग पर क्लिक किया जाए तो वह भी कल के मशहूर बाबा बन सकते हैं। एक टीवी कलाकार ने इन दिनों बाबा के खिलाफ कंप्लेन की है, यह बताते हुए कि बाबा ने अपने शुरुआती दौर में हमें प्रतिदिन का मेहनताना देकर सभा में सवाल पूछने के लिए बुक किया था। बाद में बाबा की दुकान चलने लगी तो उन्होंने धोखा देना शुरू कर दिया। आज बाबा कहां हैं और वह टीवी कलाकार वहीं की वहीं है। दरअसल, बाबा की दुकानदारी चलाने वाले भी तो हम खुद ही हैं। आखिर हम क्यों भगवान को छोड़कर इस प्रकार के आम इंसान की भगवानी बातों के भंवर में फंस जाते हैं।

बाबा ने जो किया है, मेरे ख्याल से वह सही है, गलत हैं तो केवल हम। अगर हम बाबा को भगवान को दर्जा ही न देते तो बाबा अपने इस काम में सफल ही न होते। अपने दुखों को बाबा के सामने माइक पर गाकर कहीं, हम उस सृष्टि, अन्नदाता, भगवान और ईश्वर को चैलेंज तो नहीं कर रहे हैं। अगर हां, तो इसका खामियाजा भी हमें निर्मल बाबा जैसे लोगों के रूप में भुगतना तो पड़ेगा ही। मेरा मानना है कि ईश्वर एक है, उसी ने पूरी दुनिया बनाई है, हर धर्म का रास्ता कहीं न कहीं जाकर उसी एक ताकत से मिलता है। फिर हम कब अपने अंदर सुधार लाएंगे। कब ऐसे बाबाओं को पनपने से रोकने का प्रयास करेंगे। केवल कुर्सी पर बैठकर और घर की आलमारी में 10 रुपए के नोटों की गड्डी रखकर ही कोई अमीर नहीं बन जाता। अमीर बनने के लिए तो मेहनत करनी पड़ती है। सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता है, तो भला इस शॉर्टकट की तलाश में कहीं हम भी तो बाबा के रास्ते नहीं चल रहे?

Saturday, March 24, 2012

जाने कहां गए वो दिन...


घर की बालकनी में दो पल सुकून के तलाशते हुए अचानक ही एक अखबारी कागज की घर की बनाई हुई पतंग पर नजर चली गई. पतंग जिस तरह हवा में गोते खा रही थी, उसे देखकर बरबस ही पुराने दिनों की यादें ताजा हो गई. ऐसी यादें जो कभी जब हवा की रफ्तार से उठती हैं तो हवा के हल्केपन के बजाए मन मस्तिष्क पर एक भारी सा बोझ पैदा कर देती हैं. पुराने नजारे को देखते और सोचते हुए ही मैं अपने अतीत में चला गया.

स्कूल से छुट््टी हुई तो गांव में पतंगबाजी ही पढ़ाई से भी महत्वपूर्ण काम माना जाता था. माता और पिता का पढ़कर आगे बढऩे का फरमान तो जैसे इस जोश में तुरंत एक गुब्बारे के पंक्चर की माफिक महसूस होता था. शुरुआती दिनों में जब घर के आंगन में आई हुई एक पतंग में थोड़ी सी सादी, डोर बांधकर उड़ाया तो लगा जैसे पंतग नहीं हवा के साथ-साथ खुद गोते खा रहा हंू. अभी आनंद अपने चरम पर भी नहीं पहुंचा था कि पीछे से मां की कर्कश सी लगने वाली आवाज ने कानों ही नहीं पूरे शरीर में एक विरोध का भाव पैदा कर दिया. आज भी तमाम ऐसे मां बाप हैं जो कि अपने बच्चे को पंतग इसलिए नहीं उड़ाने देते कि कहीं वह बिगड़ न जाए या फिर कहीं उसकी परसेंटेज कम न रह जाए. लेकिन बालमन तो बावरा होता है, भला कहां किसी की सुनता है. सुनता है तो करता तो खुद के ही मन की है. सो, मैं भी आंख चुराकर चल पड़ता पतंग उड़ाने. हवा के रुख के चलते हर दिन कम से कम एक पतंग को कटकर घर पर आ ही जाती थी. सो मेरे पास पतंग का स्टॉक भी खासा था. बस मां, उड़ाने दे, तब ना.

एक दिन हनक चढ़ी और अपने एक मित्र के साथ चल पड़ा मांझा खरीदने. खूब पतंगबाजी की और दिनभर खूब मजा लिया. शाम को पिताजी की डांट ने हालांकि इस आनंद का नशा पलभर में काफूर कर दिया. खैर, पतंग के बहाने ही बात चली तो आपने खुद भी अपने आसपास तमाम पंतगबाजी के नजारे देखे होंगे. कईं पतंगबाजी के माहिर भी देखे होंगे, जो कि अपने एक तिरछे पेंच से झट से सामने वाले की पतंग को धराशाई कर देता था. हमारे मोहल्ले में तो कई ऐसे नामी पतंगबाज थे, जो कि अपने एक ही दांव से सबको चारो खाने चित्त कर देने में माहिर थे.

मुझे इस बात का रंज है कि मैं इस अपने देसी अंदाज को जमकर न जी पाया. दुख इसलिए भी बढ़ जाता है कि मैं मां-बाप की इंजीनियरिंग और मास्टरी की अपेक्षाओं पर पतंगबाजी से दूर रहने के बावजूद खरा नहीं उतरा. चिंता इस बात की है कि मुझे अगर मेरी इच्छाओं के साथ पढऩे का मौका मिलता तो शायद कुछ और ही नजारा होता.
तभी पीछे से मेरी छोटी से नन्हीं तीन माह की बिटिया के रोने की आवाज आई. उसकी आवाज जैसे मुझे इशारा कर रही थी कि पापा, आप तो दोगे ना मुझे वह आजादी. मैं अपने दायरों से वाकिफ हंू, बस आप मुझे हिम्मत देते रहना, मैं आगे बढ़ती जाऊंगी. अब आकाश में न तो वह अखबारी पतंग थी और न वह यादें. शायद किसी मेरे जैसे बच्चे ने अपने मां-बाप से आंख बचाकर यह पतंग खुद ही बनाकर उड़ाने की कोशिश की होगी...

Monday, November 14, 2011

सेक्स एजूकेशन की जरूरत

भारतीय संस्कृति में सेक्सुअल एजूकेशन का जिक्र ही एक बड़ी बात कही जाती है। ऐसे में यह बच्चों को दिलाने का मामला तो जैसे भारतीय समाज में अपराध ही बन जाता है। लंबे समय से सेक्सुअल एजूकेशन को सेलेबस का हिस्सा बनाने की मांग उठती आ रही है। कभी इसमें समाज के कुछ ठेकेदार रोड़ा बन जाते हैं तो कई बार हम खुद ही। इस बीच जब सेक्सुअल हैरेसमेंट के मामले सामने आते हैं तो एक बार फिर सेक्सुअल एजूकेशन का मुद्दा गरम हो जाता है।
मुंबई के एक नामी स्कूल में कुछ महीने पहले ही एक बच्चे के साथ स्कूल के खेल शिक्षक द्वारा सेक्सुअल हैरेसमेंट का मामला सामने आया तो जैसे पूरे समाज में फिर खलबली मच गई। बच्चे का कई महीनों से हैरेसमेंट हो रहा था लेकिन उसे यह जानकारी नहीं थी कि यह गलत है। हां, उसे दर्द होता था और टीचर उसे नाम काटने की धमकी देकर चुप करा दिया करता था। किस्मत से पुलिस की छानबीन में मामला खुला तो आरोपी टीचर को जेल हो गई। दूसरे वाकया सामने आया है एजूकेशन हब के नाम से विख्यात देहरादून में। रविवार की अलस्सुबह एक मासूम बच्चा अपने पिता के साथ शहर कोतवाली में पहुंचा। बच्चे के चेहरे पर जो डर था, वह बता रहा था कि उसके साथ कुछ बुरा हुआ है। बच्चे को प्यार से वजह पूछी तो उसने पूरी बात बतानी शुरू कर दी। उसने मासूमियत भरे लहजे में जब पूरी बात बताई तो पुलिस ही नहीं वहां मौजूद सभी लोगों के रोंगटे खड़े हो गए. सात साल के बच्चे ने सुबकते हुए बताया कि उसके हॉस्टल का वार्डन हर रात उसके साथ गंदा काम करता है। यह खुलासा सुनकर हरकत में आई दून पुलिस ने बच्चे को मेडिकल कराया तो उसमें भी कुकर्म की पुष्टि हो गई। हालांकि बच्चे को इस गंदे काम की जानकारी न होने की वजह से वह पिछले कई महीनों से इस दरिंदे का शिकार हो रहा था लेकिन एक दिन अचानक ही वह हॉस्टल से भागकर घर पहुंचा तो ही यह मामला खुल पाया। बताया जा रहा है कि इस बच्चे की माफिक ही इस दरिंदे ने स्कूल के तकरीबन 20 बच्चों को अपनी हवस का शिकार बनाया है, हालांकि जांच अभी जारी है।
यह दो मामले कहीं न कहीं सेक्स एजूकेशन की कमी की वजह भी कहे जा सकते हैं। अगर बच्चों को सेक्स एजूकेशन दी जाए तो कहीं न कहीं उन्हें इस प्रकार के गंदे कामों की जानकारी हो। दून की मशहूर साइकोलॉजिस्ट डा. वीना कृष्णन का इस मसले पर अलग ही मत सामने आता है। उनका कहना है कि पहले इस प्रकार के चार में से दो मामले होते थे तो अब हर दो में से एक मामला बच्चों के सेक्सुअल हैरेसमेंट का सामने आ रहा है। इसकी वजह से एक ओर जहां बच्चे टूट रहे हैं तो दूसरी ओर उनकी मानसिक यातना से परिवारों पर भी बुरा असर पड़ रहा है। डा. के मुताबिक अगर इस प्रकार के मामलों पर रोक लगानी है तो बच्चे को सेक्सुअल नॉलेज देनी जरूरी है। उनका कहना है कि इस प्रकार के मामलों से बचने के लिए अगर स्कूलों में सेक्स एजूकेशन न भी हो तो मां को अपने मासूम बच्चे को उसी के लहजे में अच्छे बुरे की जानकारी देनी चाहिए। अगर ऐसा किया जाएगा तो बच्चे के साथ इस प्रकार की हरकत होते ही वह मां को आकर बताएगा। इससे काफी हद तक इस प्रकार की हैवानियत पर रोक लग सकेगी।

Monday, February 14, 2011

वेलेंटाइन डे नहीं वी-केयर डे

वेलेंटाइन डे का दिन हम जैसे शादीशुदा प्रोफेशनल पुरुषों के लिए पत्नी को विश करने के बाद अपने अखबार में बेहतर से बेहतर कवरेज देने के लिए माना जाता है। हम भी इस दिन नए से नए एंगल की खबरें लाकर अपने रीडर्स को रिझाने की कोशिशें करते हैं। लेकिन इस बार के वेलेंटाइन डे ने जो खबर मुझे दी, वाकई वह खबर थी। खबर इसलिए क्योंकि वह उनसे जुड़ी थी जो हमारे देश का भविष्य है। खबर लिखने के बाद मुझे इस बात का अहसास हुआ कि हमारा युवा वर्ग अगर इतना हटकर सोचेगा तो एक दिन यहां भी हम कोई नई क्रांति जरूर ले आएंगे।

दरअसल मामला है वेलेंटाइंस डे को जरा हटकर मनाने का। देहरादून के टॉप के चार कॉलेजों के युवाओं ने मिलकर इस दिन में एक नई इबारत लिख दी। यहां के हजारों युवा प्यार के इस दिन में एक जगह इकट्ठा हुए और वेलेंटाइंस डे नहीं, वी-केयर डे के तौर पर मनाने का फैंसला किया। इन युवाओं ने एक रैली निकालकर यह पैगाम देने की कोशिश की कि हम केवल अपने प्यार को ही प्यार नहीं करें बल्कि अपने देश को भी दिल से ही प्यार करें। रैली के साथ ही इस नई क्रांति की शुरुआत हो चुकी है। युवाओं का कहना है कि अब उन्होंने वेलेंटाइंस डे को वी केयर डे के तौर पर मनाने की मुहिम शुरू कर दी है। इसी मुहिम के तहत निकाली गई रैली में युवाओं ने पर्यावरण, गर्ल चाइल्ड, टाइगर जैसी तमाम उन मामलों के प्रति जागरुकता बढ़ाई जो कि आज की जरूरत है। रैली महज एक रैली नहीं है, बल्कि इस मुहिम को फेसबुक, आर्कुट जैसी नेटवर्किंग साइट्स और ब्लॉग का भी सहारा खूब मिल रहा है। आयोजक युवाओं का कहना है कि अगले साल से वह इस रैली को केवल दून ही नहीं बल्कि देश के चार अन्य मेट्रो सिटीज में भी निकालेंगे। एक युवा ने तो यहां तक कह दिया है कि वह अपनी कोशिशों से इस दिन को इस कदर पॉप्यूलर करना चाहते हैं कि 2015 तक पूरा देश वेलेंटाइंस डे को वी-केयर डे के तौर पर मनाएं।

कहते हैं अगर युवा जोश किसी काम में लग जाता है तो पहाड़ सी अड़चने भी पलभर में दूर हो जाती हैं। अब इन युवाओं ने भी एक कोशिश करने की कोशिश की है, अब यह कोशिश कितनी कामयाब होगी, यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन इतना तो तय है कि हमारा युवा भी अपने विचारों से क्रांति लाना जानता है।

Thursday, February 10, 2011

बोल बाबा बोल…


वेलेंटाइन वीक शुरू होने के साथ ही सड़कछाप बाबाओं की भी मौज हो जाती है। महीनों तक ग्राहक का इंतजार करने वाले कथित ज्योतिषियों की तो जैसे प्यार के इस मौसम में बांछे खिल जाती हैं। हर प्रेमी अपनी प्रेमिका को प्याज का इजहार करने के साथ ही अपने प्यार की उम्र जो देखना चाहता है। कई ऐसी कहानियां होती हैं, जो कि आज शुरू होकर कुछ ही दिनों में यादों में धूमिल हो जाती हैं। हालांकि हमारा युवा ज्योतिषियों पर कम ही यकीन करता है लेकिन आज भी ऐसे युवाओं की संख्या कम नहीं है। अब सवाल यह है कि क्या खुद का भविष्य संवारने के लिए जद्दोजहद करने वाला बाबा आपके प्यार का भविष्य बता सकता है?


रोज डे पर दून के गांधी पार्क में ऐसे जोड़ों की काफी संख्या पाई जाती है। घर से स्कूल-कॉलेज के बहाने पार्क में मिलना, रोज देना, प्रपोज करना, हग करना…पूरे वीक का सेलिब्रेशन। आजकल यहां के आसपास मंडराने वाले बाबाओं की खूब मौज आ रही है। आज ऐसे ही एक बाबा का पूरा नजारा मैने अपनी आंखों से देखा।

एक प्रेमी युगल एक कथित बाबा के पास बैठा हुआ था। दोनों के माथों पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थी। प्रेमी का दिया हुआ गुलाब, प्रेमिका के हाथ में था लेकिन दूसरा हाथ बाबा के हाथ में था। बाबा बोले जा रहा था…बच्चा तुम्हारे जीवन में अभी प्रेम के योग दिखाई नहीं दे रहे हैं…तुम्हारी हस्तरेखाएं बता रही हैं कि तुम अपने प्यार को ज्यादा दिन संभाल नहीं पाओगी। लड़की की चिंताएं बढ़ती जा रही थी। मैं पूरा नजारा अपनी आंखों से देख रहा था। पास में बैठा प्रेमी संकुचा रहा था, दिमाग में सवाल घूम रहा होगा कि ऐसे कैसे हमारा प्यार अमर होगा? दोनों ने बाबा को 50 रुपए दिए और चिंता के साथ ही चलते बने। अब पूरा नजारा देखने के बाद मैं खुद सवालों से घिर गया। आखिर एक बाबा, हमारे प्यार को कैसे परिभाषित कर सकता है? क्या प्यार हस्तरेखाएं देखकर किया जाता है? अगर लैला-मजनू भी किसी ऐसे बाबा के चंगुल में फंस जाते तो क्या उनकी कहानी प्रेमियों के लिए एक आदर्श होती? क्या दूसरी तमाम प्रेम कहानियां भी हस्तरेखाएं देखकर शुरू हुई थी? मैं कहीं से भी ज्योतिष विद्या की बुराई नहीं कर रहा हंू लेकिन मेरा मत है कि ऐसे तमाम मामलों में इन विद्याओं से ज्यादा खुद की सोच और एक-दूसरे के प्रति समर्पण को वरीयता देनी चाहिए। प्यार को किसी भी दायरे या बंदिशों में न तो कभी रखा गया और न रखा जा सकेगा। तो फिर हम बाबा के पास अपने प्यार का भविष्य देखने के लिए क्यों जाते हैं? वेलेंटाइन वीक शुरू हो चुका है, आप भी अपने प्रेमी या प्रेमिका को दिल से विश करें और अपने भरोसे को हमेशा बनाए रखें। शुभकामनाओं के साथ…

Sunday, February 6, 2011

बेचारा इतना महंगा और बेशकीमती अखबार

एक समाचार पत्र, जिसके तैयार होने में पैसा और मेहनत दोनों लगते हैं। समाचार पत्र का हम मीडिया जगत के लोगों के लिए जो ओहदा है, आम पाठक की नजर में वह इससे बिल्कुल अलग है। यह तब देखने को मिला, जब मैं सड़क किनारे खड़ा हुआ अपने एक मित्र के आने की प्रतीक्षा कर रहा था। मैं प्रतीक्षारत था तो एक थ्री व्हीलर मेरे पास आकर रुका। थ्री व्हीलर में तब सवारियां न होने की वजह से वह रुककर बीड़ी जलाने लगा। तभी मेरी नजर उसके स्टेयरिंग के पास पड़े एक अखबार पर गई। मेरे मन में तुरंत सवाल पैदा हुआ कि आखिर एक शख्स जो दिनभर सवारियों को बैठाने और उतारने में लगा रहता है, वह इस समाचार पत्र का अध्ययन कब करता होगा? अपने सवाल का जवाब पाने के लिए मैं भी तुरंत ही थ्री व्हीलर चालक के पास पहुंच गया। उसने जो जवाब दिया, वह वाकई चौंकाने वाला और मनोरंजक था।

मैंने विक्रम चालक से पूछा, भई तुम दिनभर तो सवारियों से घिरे रहते हो तो ऐसे में अखबार कैसे पढ़ पाते हो? विक्रम चालक ने जवाब दिया कि वह अखबार पढऩे के लिए नहीं खरीदता, बल्कि उसकी सवारियां अपना टाइम पास कर लें, इसके लिए खरीदता है। उसने यह भी बताया कि उसके लिए इस अखबार का यह फायदा है कि दिनभर जब सैंकड़ों सवारियों की आंखों से इसकी स्कैनिंग हो जाती है तो वह इससे हर सुबह की शुरुआत इस अखबार से अपने विक्रम के शीशे साफ करने के लिए करता है। यानी एक समाचार पत्र, जिसके निर्माण में 15 से 20 रुपए तक का खर्च आता है, एक आम पाठक के लिए उसकी औकात सिर्फ शीशा साफ करने की है।

अब सवाल यह है कि एक पाठक के लिए इससे ज्यादा औकात क्यों होनी चाहिए तो आपका जवाब भी दिए देता हंू। विदेशों से अगर हम तुलना करें तो वहां का रिक्शा मजदूरी करने वाला व्यक्ति भी अखबार का गहनता से अध्ययन करता है। मजदूरी के दौरान जब भी उसे फुरसत मिलती है तो वह अखबार पढऩे में उस वक्त का इस्तेमाल करना बेहतर समझता है, जबकि हमारे देश में आज भी इतनी निरक्षरता है कि कम पढ़े लोग भी अखबार को सिर्फ अपनी दूसरी जरूरतों के लिए प्रयोग में लाते हैं। उनके लिए अखबार का प्रयोग अपने ज्ञान में वृद्धि करने के बजाए अपने दूसरे कामों में करने का होता है। आखिर कब बदलेगा हमारा अंदाज, कब बदलेंगे हम? कब होगा इस अखबार का सही प्रयोग? ऐसे तमाम सवाल मन में लिए हुए मैं घर को चलता बना।

आखिर गुजरात की तारीफ में बुराई ही क्या

मुस्लिम समाज का दुनिया में एक बड़ा संस्थान दारुल उलूम देवबंद आजकल विवादों के घेरे में है। यहां से जारी होने वाले फतवों को दुनियाभर के मुस्लिम मानते हैं। मुस्लिम समाज में इस संस्थान को जो ओहदा यानी इमेज है, वह देशभर में चुनिंदा संस्थानों की ही है। पुराने वाइस चांसलर के इंतकाल के बाद यहां गुजरात के रहने वाले मौलाना वस्तानवी को नया वाइस चांसलर नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के कुछ ही दिनों बाद यहां एक बात बवाल की वजह बन गई। मीडिया ने खूब हाइप दी तो मामला देशभर के मुस्लिमों के पास तक पहुंच गया। अब मस्जिदों में नमाज अदा करते हुए दुआएं मांगी जा रही हैं कि अल्लाह इस संस्थान की आबरू और इमेज बनाए रखे। आखिर आज ऐसी क्या बात हो गई जो मुस्लिम समाज के लिए रोशनी बनने वाले इस संस्थान में आशंकाओं के बादलों से अंधेरा छा रहा है।

दरअसल मामला है गुजरात की तरक्की की तारीफ का। हुआ यंू कि नए वाइस चांसलर ने बीस साल पहले के गुजरात और वर्तमान गुजरात की तुलना कर दी। इस तुलना में उन्होंने कहा कि तब के गुजरात की अपेक्षा अब हालात काफी बदल गए हैं। विकास तेजी से हो रहा है, गुजरात बदल रहा है। इसमें उन्होंने कहीं भी नरेंद्र मोदी की तारीफ नहीं की। अब कुछ बवाली किस्म के लोगों ने इस बयान को इस कदर चेंज किया कि मुस्लिम समाज के काफी लोग इसका विरोध जताने पर उतारू हो गए। नए वीसी ने कई बार अपनी सफाई दे दी है कि उन्होंने सिर्फ गुजरात के विकास की तारीफ की है, लेकिन चंद बवाल काटने वाले लोग अपने काम में इस कदर मस्त हैं कि वह यह भूल गए कि यह उनके ही एक बड़े संस्थान की इज्जत का मामला है। आखिर यह संस्थान अकेले नए वीसी का नहीं है, यह संस्थान हैं उन मुस्लिमों का जो कि इससे जारी होने वाले हर फतवे को बेहद तहजीब के साथ पेश आते हैं। यह संस्थान है उन युवाओं का जो देश ही नहीं दुनियाभर से यहां शिक्षा लेने के लिए आते हैं। अब सवाल यह है कि अगर किसी ने गुजरात की तारीफ कर ही दी तो इसमें बुराई क्या है? आखिर इस्लाम ऐसी शिक्षा तो नहीं देता कि हम अपनी आंखों के सामने की सच्चाई को झूठ बोलकर बरगला दें। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। गुजरात के भी ऐसे ही दो पहलू हैं। इनमें एक पहलू तो विकास का है और दूसरा पहलू यहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का है, जिन्हें मुस्लिम समाज में अलग दृष्टि से देखा जाता है। मेरा मानना है कि तारीफ चाहे किसी भी चीज की हो, आंखों के सामने देखकर करने में कोई बुराई नहीं है। दुआ है कि बवाल करने वाले लोगों को भी यह बात समझ में आ जाए, ताकि एक इस्लामी संस्थान की छवि धूमिल होने से बच जाए..|

Thursday, January 27, 2011

हमारी एकता दुनिया के लिए मिसाल है

एक देश, 28 राज्य, 1618 भाषाएं, 6400 जातियां, 6 धर्म, 6 एथनिक ग्रुप और 29 मेजर फेस्टिवल्स। यह है उस हिंदुस्तान की पहचान, जिसमें दीवाली में अली और रमजान में राम बसते हैं। 62वें गणतंत्र दिवस पर हम हमारी एकता को दिल से सम्मान और सलाम करते हैं। इन 62 सालों में न जाने कितनी बार हमें तोडऩे के प्रयास विफल हुए, न जाने कितने लोगों ने हमारी देशभक्ति को तोडऩे का असफल प्रयास किया होगा। बावजूद इसके हम एक थे और हमेशा एक रहेंगे. हमारी एकता और अखंडता की मिसाल आज दुनियाभर में लोगों के सामने है। ऐसी ही एकता की एक मिसाल हम आपके सामने भी रख रहे हैं।
बेहद छोटी मगर मोटी बात है…।


टेंपल, चर्च और मॉस्क्यू…तीनों ही वर्ड छह एल्फाबेट से मिलकर बने हैं, यानी तीनों शब्दों में एकता का सार आता है। इसी प्रकार गीता, कुरान और बाइबिल…तीनों ही शब्द पांच एल्फाबेट से मिलकर बने हैं, यानीं यहां भी हमारी एकता का सार आता है। हमारी एकता को अगर मिसाल कहें तो कोई दोराय नहीं होगी लेकिन इस मिसाल को एक शायर ने कुछ इस अंदाज में बल दिया है…
कहीं मंदिर बना बैठे, कहीं मस्जिद बना बैठे
तुमसे तो अच्छी है उन परिंदों की जात
जो
कभी मंदिर पे जा बैठे और कभी मस्जिद पे जा बैठे।।

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने देश की एकता के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। उनका एकता का दीवानापन ही अंत में उनकी जान का दुश्मन बन बैठा। अब सवाल यह उठता है कि धर्म अलग-अलग होने से क्या फर्क पड़ता है? हमारी रगो में बहने वाला खून और हमारी सांसों में जाने वाली ऑक्सीजन, कहीं से भी धर्म का फर्क नहीं करती है। हमारे पेट में जाने वाला अन्न और हमारे शरीर में जाने वाला पानी, कहीं से भी अलग नहीं होता। हमारे घर में पैदा होने वाला बच्चा और हमारी जीवन के अंत का सार स्वर्ग और नरक, कहीं से भी जुदा नहीं है। हमें इन बातों पर गर्व करना चाहिए और देश की एकता और अखंडता के लिए अपनी ओर से बेहतर प्रयास करने चाहिएं।

…जय हिंद, जय भारत


Wednesday, January 19, 2011

तुम मेरे साथ हो, रोशन है आंगन मेरे दिल का...

तुम मेरे साथ हो रोशन है आंगन मेरे दिल का
तुम न होती तो रोशनी कहां से लाता

कह देते एक बार भी मुझे
चांद-तारे मैं तोड़ लाता
हवाओं का रुख मैं मोड़ लाता
तुम मेरे साथ हो रोशन है आंगन मेरे दिल का।।

मोहब्बत का दर्द समझ जाता मैं
गर प्यार की भाषा में कह पाता
शब्दों को जोडऩा न सीख पाता मैं
इश्क की महकार से गुलजार गर न होता
तुम मेरे साथ हो रोशन है आंगन मेरे दिल का।।

बेशक इश्क की राहों का अंजान था मैं
तुम आसरा न देती तो भटक जाता
तूफानों से सामना न हुआ था कभी
तुम न होती तो भंवर में डूब जाता
तुम मेरे साथ हो रोशन है आंगन मेरे दिल का
तुम न होती तो रोशनी कहां से लाता।।

--फॉर माई लविंग वाइफ

Sunday, January 16, 2011

कितना बदल गया इंसान

100 का नोट बहुत ज्यादा लगता है, जब किसी गरीब को देना हो लेकिन होटल में तो बहुत कम लगता है…तीन मिनट भगवान को याद करना मुश्किल है लेकिन तीन घंटे की फिल्म देखना आसान है…पूरे दिन मेहनत के बाद दोस्तों के पास मस्ती करने से नहीं थकते लेकिन जब मां-बाप के पैर दबाने हों तो लोग तंग आ जाते हैं…वैलेंटाइन डे पर 200 रुपए का गिफ्ट अपनी प्रेमिका के लिए ले जाएंगे लेकिन मदर्स डे पर एक गुलाब अपनी मां को नहीं देंगे…यह है उस बदलते हुए इंसान की हकीकत जो हम सबके सामने है, जो हम सब हैं और जो हम सब कर रहे हैं। हम घर से बाहर जाते हैं तो फेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट करके पूरी दुनिया में ढिढ़ोरा पीट देंगे लेकिन अगर मां-बाप पूछ लेंगे तो जैसे आंखों में खून उतर आता है। हम आज जवान हैं तो दुनिया का हर पल और हर लम्हा हमारे साथ है लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि कल हमें भी बूढ़ा होना हैं। अगर हम आज अपने बुजुर्गों का सम्मान नहीं करेंगे तो कल हमारे साथ भी वही होगा जो हम करेंगे। यह बदलाव बेहद खतरनाक है, जिसमें रिश्तों की मर्यादाएं तो टूट ही रही हैं, हमारा भरोसा भी बिखर रहा है। एक नजीर आपकी पेशे नजर है।
एक दिन फुरसत के लम्हों में मैं अकेला ही एक पार्क में जाकर बैठ गया। सर्दी में अगर धूप की झलक भी बदन को मिल जाए तो जैसे एक अलग ही ऊर्जा का संचार होता है। उस दिन भी मैं ऐसी ही ऊर्जा का आनंद ले रहा था कि मेरे पीछे वाली एक सीट पर दो लड़कियां आकर बैठी। देखने में सभ्य से परिवार की दिख रही यह कन्याएं खासी मित्र प्रतीत हो रही थी। सीट पर बैठने के साथ ही इनकी बातें शुरू हुई, लग रहा था जैसे काफी दिनों की बाद एक-दूसरे से मुलाकात हुई हो। मैं गुनगुनी धूप में अलसाया सा प्रकृति का पूरे आनंद में लीन था लेकिन एक बात ने मुझे नींद से उठाकर खड़ा कर दिया। इनमें से एक लड़की ने दूसरी से कहा कि, वह तेजी से मोटी हो रही है, पेट भी तेजी से फैटी हो रहा है। इस पर सामने वाली लड़की को जो जवाब मिला, उससे मैं भी भौचक्का रह गया। उसने तुरंत सलाह दे दी कि, यार एक ब्रेकअप कर ले, एक महीने के अंदर ही पूरा मोटापा खत्म हो जाएगा। मैं नहीं जानता कि वह उनकी नादानी थी या फिर जानबूझकर की जाने वाली बेवकूफी भरी बात। बस इस बात ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया, कि रिश्ते और प्यार की अब बस इतनी कद्र रह गई है। हमें अगर मोटापा भी कम करना है तो हमें ब्रेकअप का सहारा लेना होगा। मैं धिक्कारता हंू ऐसी शिक्षा को जो हमारी नई पीढिय़ों को ऐसे संस्कार दे रही है, जहां रिश्तों की कोई मर्यादाएं ही नहीं हैं। इंसान बदल रहा है…इस पर मुझे आज वो एक भक्ति गीत याद आ रहा है…
देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान
कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान…

Friday, December 24, 2010

हिंदू आतंकवाद पर इतना हल्ला क्यों???

हिंदू आतंकवाद, नाम जुबान पर आया तो जैसे बवाल होना शुरू। राहुल गांधी ने इसका नाम लिया तो विपक्षियों ने जैसे जान की आफत बना दी। अब यूपी के एक नेता आजम खां ने इसका नाम लिया तो सियासी भूचाल फिर अपने चरम पर आ गया। भगवा या हिंदू आतंकवाद को लेकर बवालों का यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। समझ नहीं आता कि इस शब्द पर इतनी आपत्ति क्यों है?
पिछले कुछ सालों में आतंकवाद के बदलते परिदृश्य पर नजर डालें तो बात साफ होती दिखाई दे रही है। कल तक जब कोई मुस्लिम कहीं आतंकवाद के शक पर गिरफ्तार किया जाता था तो उसे इस्लामिक आतंकवाद का नाम दिया जाता था। पड़ोसी देश पाकिस्तान के इस आतंकवाद ने हमें इस कदर झुंझलाहट से भर दिया कि अब इस्लाम का मतलब आतंकवाद ही नजर आने लगा। हर इस्लाम धर्म वाला कहीं न कहीं शक की निगाहों से देखा जाने लगा। आतंकवाद का दायरा बढ़ा तो कई हिंदू नाम और संगठन भी इसमें अग्रणी दिखाई दिए। यानी साध्वी प्रज्ञा का नाम हो या विस्फोट के आरोप में पकड़े गए दूसरे गैर मुस्लिमों का, हर कोई काम वही कर रहा है जो इस्लामिक आतंकवाद वाले आतंकवादी करते हैं। अब अगर मुस्लिम आतंकवादियों को इस्लामिक आतंकवाद की संज्ञा दी जाती है तो भला हिंदू आतंकवादियों को हिंदू आतंकवाद का नाम देने में बुराई क्या है। आज भी अगर एक मुसलमान किसी शक पर गिरफ्तार किया जाता है तो उसे मीडिया में भी आतंकवादी की संज्ञा साबित होने से पहले ही दे दी जाती है, जबकि अगर कोई हिंदू विस्फोट के शक में गिरफ्तार किया जाता है तो उसे आतंकवादी नहीं आरोपी कहा जाता है।
मैं दोनों धर्मों का दिल से सम्मान करता हंू और जहां तक मैं मानता हंू कि इस आतंकवाद शब्द से वास्ता रखने वाले लोगों का कोई धर्म ईमान ही नहीं होता। जो इंसान होता है उसके लिए तो सब बराबर होते हैं, चाहे हिंदू हो या मुसलमान। मेरा तो मानना है कि इस शब्दों को बढ़ावा देने वाली या तो हमारी मीडिया है या फिर हमाने वोट के पुजारी नेता। नेताओं ने एक जरा सी बात को इस कदर चढ़ा दिया है कि आम इंसानों में जहर भरने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। आखिर हम आम जनता को इस बात से क्या फर्क पड़ता है, हमारे पड़ोसी गुप्ता जी को कल हमारे साथ ही ईद मनानी है तो हमें भी उनके साथ ही दीवाली की खुशियों के पटाखे फोडऩे हैं. हमारा देश ऐसा है कि यहां लाख दीवारें खड़ी करने की कोशिश की गई हैं लेकिन हम सब कहीं न कहीं, किसी न किसी मंच पर एक ही खड़े दिखाई दिए हैं।

Thursday, December 23, 2010

कहीं हम मैंगो पीपुल के लिए वीआईपी न बन जाए प्याज

प्याज, वह नाम जो हर आम आदमी की जुबान पर आते ही कड़वा स्वाद खुद पैदा कर देता है। हालांकि कल तक यह प्याज हम सबका चहेता था। हम रेस्टोरेंट में भोजन करने जाते थे तो खाने के थाली के साथ फ्री में खूब सजावट के साथ हमारे सामने पेश किया जाता था। आज हम खाना खाने जाते हैं तो प्याज खाने के लिए डिमांड करनी पड़ती है। लगता है जैसे प्याज अब वीआईपी नंबर सरीखा हो चुका है, जो कि सिर्फ डिमांड पर ही ज्यादा पैसे देकर लिया जाता है। नेताजी हों या दूसरे वीआईपी उनके लिए तो आज भी इसकी वैसी ही वैल्यू है, जैसी पहले थी।

कई दिनों से प्याज की महंगाई की खबर पढऩे और लिखने के बाद आज आखिरकार प्याज खरीदने की बारी आई। घर से प्याज खरीदने के लिए निकलते वक्त दिल धुक-धुक कर रहा था, जैसे सोना खरीदने से पहले करता है कि कहीं फिर दाम न बढ़ गए हों। हालांकि मुझे इस बात का गर्व था कि आज मैं इतना महंगा प्याज खरीदने जा रहा हंू, लेकिन दुख इस बात का था कि मेरे जैसे हजारों आम आदमी इससे दूर हो चुके थे। ऊपर से दाम बढऩे की आशंका ने इस डर को और बढ़ा दिया। मार्केट पहुंचा तो राहत मिली कि प्याज के दाम पांच रुपए कम हो गए थे। लेकिन यह कितने समय रहे होंगे, कहना मुश्किल है। जिस रफ्तार से प्याज के दाम बढ़े हैं, तो लगता है जैसे शताब्दी एक्सप्रेस भी शर्मा जाएगी। अरे, मुझे तो अब ऐसा लगने लगा है कि प्याज कहीं कल वीआईपी न हो जाए। भई, महंगी चीजें तो आम आदमी से दूर ही होती हैं लेकिन वीआईपी के लिए हर तरह से उपलब्ध होती हैं। अभी आप देख सकते हैं कि हम आम आदमी की किचन में प्याज की मात्रा नगण्य सी होगी लेकिन नेताजी या हमारे दूसरे वीआईपीज की किचन में बोरियों के तादाद में प्याज होगा। अब अगर प्याज वीआईपी बन गया तो हम मैंगो पीपुल का क्या होगा?

Tuesday, December 21, 2010

लब खोलता नहीं कोई जुल्म…

साल शुरू होते हुए महंगाई डायन का प्रकोप ऐसा शुरू हुआ कि साल बीतने के साथ ही आल इज नोट वेल में तब्दील होता दिखाई दे रहा है। साल के शुरू में आमिर खान की फिल्म थ्री इडियट के डायलॉग आल इज वेल ने आम जनता को एक राहत दी थी, कि जब भी कभी कोई आपत्ति आए तो आप इस वाक्य को ‘अहं ब्रह्मास्मि की तर्ज पर बोलकर दिल को समझा सकते हैं। साल बीतने के साथ ही यह आल इज वेल, महंगाई डायन की वजह से नोट वेल में तब्दील होता जा रहा है। महंगाई तेजी से बढ़ रही है लेकिन हर तरफ खामोशी है।
मुझे आज भी याद हैं बीजेपी सरकार के वो दिन जब मेरे एक गुरुजन ब्रहमदत्त शर्मा ने एक कविता लिखी थी-
‘80 रुपए प्याज हैं बिके, 20 रुपए हैं सेव, जनता का घर लूट कर अपना घर भर लेव।
तब बीजेपी को इस महंगाई की वजह से सत्ता गंवानी पड़ी थी। तब लगता था कि जरा सी महंगाई जनता पर कितना प्रभाव डालती है। लेकिन अब कांग्रेस सरकार को इतना लंबा समय हो गया। लोगों की महंगाई कम होने की उम्मीदें दूर होती दिखाई दे रही हैं। हालात इस कदर चिंताजनक हैं कि सरकार ने तेल मूल्यों से अपना नाम जनता को बरगलाने को हटा तो लिया लेकिन बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी होगी कि किरीट पारिख समिति की सिफारिशों को जून में लागू कर दिया गया था। इसके तहत पेट्रोलियम पदार्थों के दामों के विनियमन की सिफारिश की गई थी। इस विनियमन (अब तेल के दाम सरकारी कंपनियां तय करती हैं, लेकिन बढ़ाने से पहले सरकार की इजाजत जरूरी) के बाद पेट्रोलियम पदार्थों के दाम में पिछले छह महीने में पांच बार बढ़ोतरी हुई है। पेट्रोल के दामों पर अगर सालभर गौर करें तो पता चलता है कि इनमें एक साल में सात बार अभी तक बढ़ोतरी हो चुकी है। तेल महंगा, खाना महंगा, अब तो प्याज फिर बीजेपी सरकार की याद दिला रही है। प्याज के दामों में अचानक से उछाल दर्ज किया गया है, जिससे यह दो दिन के अंदर ही 30 रुपए किलो से बढ़कर 70 रुपए किलो तक पहुंच गए हैं। नेताजी घोटालों में बिजी हैं, वोट देकर सत्ता दिलाने वाले बेचारे हम महंगाई डायन के असर से आजिज हैं। कोई कुछ बोलने को तैयार ही नहीं है। आज मुझे एक शायर की वो शायरी याद आ रही है-
‘लब खोलता नहीं कोई जुल्म के खिलाफ
ताले लगे हों जैसे सभी की जुबान में

Monday, December 6, 2010

...और वो भी चल बसी

सोमवार की सुबह हर अखबार में एक छोटी मगर दर्दनाक खबर छपी थी- पिता की डांट से क्षुब्ध होकर बेटे ने खुद को गोली मारी। यह दर्दनाक खबर अगले दिन उस बेटे की मौत के साथ ही और भी दुखदायी हो गई। बाप अपने इकलौते बेटे की चिता को आग लगाने से पहले गम की आग में खुद जल रहा था कि मंगलवार के अखबारों की सुर्खियों में इसी परिवार की दूसरी मुसीबत की खबर छपी। यह खबर थी, उस बहू की जो कि महज कुछ घंटे ही विधवा जैसी रह पाई। अपने पति की मौत का गम इस बहू को इस कदर हुआ कि उसने भी खुदकुशी कर ली।
देहरादून के रहने वाले एक परिवार में दो दिन पहले ही खुशियों का जश्न मनाया गया था। इस जश्न की वजह थी, बहू की गोद भराई। बेटे ने भी अपनी पत्नी को इस खुशी के बदले में एक एक्टिवा गिफ्ट करने का वादा किया था। बहू भी इस परिवार के वंश को आगे बढ़ाने को लेकर आतुर थी। लेकिन...
यह क्या, बेटा रात को शराब पीकर आया, पिताजी ने शराब न पीने की हिदायत दी। थोड़ी देर के बाद बेटे ने बाथरूम में जाकर खुद को अपने लाइसेंसी पिस्टल से गोली मार ली। गोली खोपड़ी में लगी तो बेटे को आनन फानन में हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया। बूढ़ा बाप अपने बुढ़ापे के सहारे को बचाने के लिए भगवान से रातभर आंसू बहाकर प्रार्थना करता रहा, मां को तो जैसे कोख उजडऩे के नाम पर भी बेहोशी सी छा रही थी। आखिरकार बेटे ने मंगलवार की सुबह दुनिया से विदा ले लिया। बेटे का पोस्टमार्टम कराकर अभी उसे घर ला भी नहीं पाए थे कि पति की मौत के विलाप से टूट चुकी पत्नी ने घर की तीसरी मंजिल पर जाकर नीचे छलांग लगा दी। दो पल में ही बहू भी इस दुनिया से विदा हो गई और इसके साथ ही विदा हो गई वह उम्मीदें, जो इस परिवार का एक वारिस लेकर आने वाली थी। इसके साथ ही गुम हो गई वह आस, जो इन मां-बाप के बुढ़ापे का सहारा बनने वाली थी।
बेटा और बहू अब इस दुनिया में नहीं हैं। बीती जनवरी को दोनों की बड़ी शान से शादी हुई थी, लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि यह युगल अपनी शादीशुदा जिंदगी का एक साल भी पूरा नहीं कर पाएगा। अपनी नादानी कहें या जज्बात, वह तो इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन अपनी मौत के साथ ही उन लोगों को भी अधमरा कर गए, जो कि कभी उन्हें अपनी शान समझते थे। आज इस परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा है। यह दुख न केवल इस परिवार बल्कि पूरे देहरादून शहर को है। बहू ने खुद को पति के वियोग में मौत के हवाले कर दिया लेकिन उन परिजनों का हाल किसी से देखा नहीं जा रहा है।
हम कई बार बेहद जज्बाती होकर कोई गलत कदम उठा लेते हैं लेकिन हम एक बार भी यह नहीं सोचते कि हमारे बाद हमारे परिवार का क्या होगा? उस मां का क्या होगा, जिसने नौ महीने तक अपनी कोख में रखकर, लाख दुख सहकर हमें जन्म दिया। उस बाप का क्या होगा, जिसने अपने बेटे में अपना भविष्य देखा, जो बेटे को अपने बुढ़ापे का सहारा समझता था। मेरी सभी से अपील है कि वह भले ही कितना भी दुख में हों, चिंता में हों लेकिन जिंदगी को हमेशा पॉजिटीव अंदाज में जिएं. जिंदगी एक बार मिलती है तो दुख और सुख तो इसके दो पहलू हैं। आज अगर सितारे गर्दिश में हैं तो कल एक नई सुबह कई खुशियां भी लेकर आएगी। खुदकुशी करने वालों को कायर कहा जाता है और मुश्किलों का डटकर सामना करने वाले शान से जीते हैं।

Sunday, December 5, 2010

फतवा सलाह है, फरमान नहीं

आमतौर पर हर दिन कहीं न कहीं से सुनने को मिल जाता है कि फलां आदमी या सेलेब्रिटी के खिलाफ फतवा जारी हो गया है। फतवे को लेकर हमारी जनता में इस कदर कंफ्यूजन की स्थिति पैदा हो गई है कि हम इसे फरमान समझ बैठते हैं। अगर इस बात की तह तक जाएं तो पता चलता है फतवा महज एक कानूनी सलाह है, फरमान नहीं।
फतवा एक अरबी भाषा का शब्द है, जिसका मायना होता है इस्लाम के नजरिए से सलाह। अब जब यहां सलाह शब्द आ जाता है तो जाहिर तौर पर यह बात भी सामने आ जाती है कि सलाह सिर्फ मांगने पर ही दी जाती है। जब तक आप किसी से कोई सलाह मांगेगे नहीं तो कोई क्यों देगा? इस सलाह को देने वाला भी कोई आम शख्स नहीं होता। इसे देने वाले विद्वान को मुफ्ती कहा जाता है। यह वो शख्स होता है, जो कि इस्लाम का बारीकी से अध्ययन करता है।
फतवे को लेकर तरह-तरह की अवधारणाएं बनी हुई हैं या यंू कहें कि इसका नाम दिमाग में आते ही इ्रस्लामिक कट्टरता सामने आ जाती है। इस्लाम को लेकर भी कई तरह की बातें होती हैं। हर धर्म में ऐसे विद्वान होते हैं जो कि धर्म की बारीकी से जानकारी रखते हैं। इस्लाम धर्म में भी यह काम मुफ्ती करते हैं, जो कि केवल मांगने पर ही फतवा देते हैं। फतवे जारी होने को लेकर कई तरह की बातें सामने आई हैं, जैसे फलां के खिलाफ फतवा जारी हुआ। यह जारी होता है लेकिन इसे लागू नहीं कहा जा सकता। इस्लाम की रोशनी में दी जाने वाली इस सलाह को मानना या नहीं मानना हमारे अपने ऊपर निर्भर करता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि फतवे को लेकर कट्टरता का भाव रखना गलत है।