विचार कभी सामान्य नहीं होते

विचार तो मन में आते हैं लेकिन हम उन्हें सही दिशा नहीं दे पाते। अपनी आंखों के सामने हर पल कुछ नया देखते हैं लेकिन उसके बारे में सोच नहीं पाते, अगर सोचते हैं तो शब्दों में ढ़ालना मुश्किल है। शब्दों में ढ़ाल भी दें तो उसे मंच देना और भी मुश्किल है। यहां कुछ ऐसे ही विचार जो जरा हटकर हैं, जो देखने में सामान्य हैं लेकिन उनमें एक गहराई छिपी होती है। ऐसे पल जिन पर कई बार हमारी नजर ही नहीं जाती। अपने दिमाग में हर पल आने वाले ऐसे भिन्न विचारों को लेकर पेश है मेरा और आपका यह ब्लॉग....

आपका आकांक्षी....
आफताब अजमत



Tuesday, October 5, 2010

जय हो ! सबकुछ बदल गया


१९वें कॉमनवेल्थ गेम्स की शुरुआत को लेकर खेल शुरू होने से पहले जो बेकरारी थी, वह अब खुशी में तब्दील होने लगी है। हमारे टेलेंट ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारत हो या दुनिया का कोई कोना, हम कहीं भी किसी से भी कम नहीं हैं। सुबह की शुरुआत अभिनव बिंद्रा और गगन नारंग के गोल्ड मेडल से हुई तो शाम होने तक भारत की झोली में सोने के तमगों की संख्या पांच हो चुकी थी। महीनों से कॉमनवेल्थ गेम्स की फजीहत करने पर जुटा मीडिया आज वाहवाही कर रहा था। इस फजीहत से बेशर्मी झेल रहे लोग भी आज गर्व महसूस कर रहे थे। भारत भूमि से पैदा हुए इस टेलेंट ने आखिर दुनिया को इंडिया की झलक जो दिखा दी। शाम को ऑफिस में जब पांचवे गोल्ड मेडल मिलने की खबर पता चली तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। दुनिया के कद्‌दावर खिलाड़ियों के सामने भारत की चुनौती सुविधाओं के लिहाज से भले ही कमजोर हो लेकिन गांधी के इस देश के युवा हर मुश्किल में भी हौंसला रखना जानते हैं। मैं दिल से सलाम करता हूं उन खिलाड़ियों को जिन्होंने मेरे देश और मेरा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है लेकिन आईना दिखाना चाहता हूं उस सिस्टम को जो कि खेल के सुधार के नाम पर महज अपनी जेबें भरने का काम करता है। जहां खेल और खिलाड़ियों के उत्थान के नाम पर मोटा पैसा लिया जाता है लेकिन नौकरशाह और हुक्मरान अपना उत्थान करने में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। जय हो के उद्‌गार के साथ खत्म हुआ उद्‌घाटन समारोह आज मुझे दोबारा जय हो बोलने को उत्साहित कर रहा है।

Saturday, October 2, 2010

हम ऐसे सहेजतें हैं अपनी विरासतें


गांधी जयंती के मौके पर बापू की याद में हर साल हम जश्न मनाते हैं, कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं, नेताजी भी कार्यक्रमों में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचकर बड़ीबड़ी बातें करते हैं। इसकी सच्चाई कुछ और ही है। जो दिखता है, वह कितना झूठ और फरेब होता है, इसकी झलक देखने को मिली देहरादून से महज ३० किलोमीटर दूर। बताया जाता है कि शहर से इतनी कम दूरी पर खारा खेत गांव में बापू ने १९३० ई। में नमक कानून तोड़ने के लिए नमक सत्याग्रह चलाया था। उनकी इस लड़ाई में गांव के लोगों ने भी बढ़ चढक़र हिस्सा लेते हुए पहाड़ से निकलने वाले नमक के पानी से नमक बनाया। इस जंग के लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। आजादी मिली तो सबको गांधी के सपनों को पूरा होने का इंतजार था। सबको इंतजार था इस ऐतिहासिक जगह को एक नई पहचान दिलाने का। आज अर्सा बीत गया, लड़ाई में शरीक हुई वो पीढ़ी भी दुनिया से चल बसी। नई पीढिय़ां भी अपने बचपन से ही एक टूटे से स्मारक को देखती आ रही हैं, जिसका शिलान्यास १९८३ में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के वित्त एवं योजना मंत्री ब्रहमदत्त ने किया था। तब इसे एक अलग पहचान दिलाने के लिए यहां सड़क तक की व्यवस्था भी करा दी गई थी। गांव के बलिदानी लोग भी सरकार और उसके नुमाइंदों की इस पहल से खुश थे। इन खुशी के पलों को सेलिब्रेट करने के लिए यहां हर साल की २० अप्रैल को एक मेला भी लगाया जाने लगा था। लेकिन अब यहां न तो कोई आने वाला है और न ही मेले की परंपरा बाकी रह गई है। इस राष्ट्रीय स्मारक के साथ ही मेले की परंपरा भी इतिहास के पन्नों में सिमट सी गई है। गांव के रहने वाले दीवान सिंह ने बताया कि यहां के पहाड़ से निकलने वाली पानी में आज भी नमक की उतनी ही मात्रा मौजूद है। आज भी जिन पत्थरों से पानी गुजरता है, वहां नमक की पर्त जम जाती है। अंग्रेजों ने भी इस पानी की खासियत को समझते हुए यहां नमक बनाने का काम शुरू किया था लेकिन आज यहां कोई पूछने तक नहीं आता। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर उत्तराखंड की राजधानी के इतने निकटतम ऐतिहासिक स्थल पहचान को मोहताज है तो दूर दराज के बलिदान और ऐतिहासिक विरासतों का क्या हाल होगा।
जय हिंद...

Wednesday, September 29, 2010

फैसला आएगा लेकिन…

बाबरी मस्जिद का मामला पिछले कई दिनों से सुर्खियों में है। पढ़ा लिखा हो या बिजनेसमैन, हर कोई ६० साल लंबी इस लड़ाई का फैसला जानने को बेताब है। ऐसे में कई जगहों पर सांप्रदायिकता को लेकर भी पूरी सुरक्षा मुस्तैद कर दी गई है। गांव में रहने वाले अनपढ़ लोगों के लिए भी यह मामला कितना अहमियत रखता है, यह देखने को मिला पिछले दिनों। एक दिन की छुट्‌टी मनाने के लिए मैं गांव गया। गांव में कम ही जाना होता है, इसलिए खानदान से लेकर पड़ोसियों से मिलना एक रिवाज सा बना हुआ है। इसी रिवाज को निभाते हुए मैं पड़ोस में रहने वाले अपने बचपन के साथी के घर पहुंचा। बात २४ सितंबर से पहले की है। मैं जाकर बैठा ही था कि मेरे दोस्त की माता मेरे पास आकर बैठ गई। नौकरी से जुड़ी हर छोटी बात शेयर करने के बाद उनके मुंह से बाबरी मस्जिद का मामला भी निकल ही पड़ा। उन्होंने तपाक से कहा, बेटा, वहां पता नहीं कैसा माहौल है, अच्छा होगा कि इस दिन अपने घर पर ही रहे। वैसे भी अगर फैसला हमारे पक्ष में नहीं आता है तो इसके लिए मरना भी शहादत में शुमार होगा। उनका यह कट्‌टरवादी लहजा मेरे जेहन में एक शूल की तरह चुभता चला गया। ताई जी पुकारता हूं मैं उन्हें। मन में एक अजीब सी बेचैनी पैदा हो गई। मैंने आखिर अपनी अनपढ़ ताईजी से पूछ ही लिया। ‘ताईजी यह बाबरी मस्जिद वाला मामला क्या है?’ मेरा यह एक सवाल ताईजी की जुबान बंद करने के लिए काफी था। ताई जी के मुंह से एक शब्द नहीं निकला। इस बात पर मुझे बड़ा दुख हुआ कि जो लोग यह तक नहीं जानते कि बाबरी मस्जिद वाला मामला है क्या, वह इस कदर कट्‌टर होने पर क्यों तुले हैं। ऐसा कैसे संभव है कि हमें किसी झगड़े की जानकारी न हो और हम उसका हिस्सा बनें। बहरहाल मैंने ताईजी को अपने अंदाज में कंवेंस करते हुए बताया कि यह सब बेकार की बातें हैं। मामला कोर्ट में है, कोर्ट का फैसला ही सर्वोच्च होगा, इसलिए हमें अपने मन की इस गंदगी को दूर करते हुए कोर्ट के फैसले का सम्मान करना चाहिए। हालांकि ताई जी अनपढ़ होने की वजह से बहुत ज्यादा कंवेंस नहीं हो सकी लेकिन ताईजी के इस लहजे ने मेरे अंदर एक सवाल पैदा कर दिया कि आखिर लाखों लोगों को अभी तक भी इस बात की जानकारी क्यों नहीं है कि यह फैसला किस बात का है? आज मुझे बड़ी शिद्‌दत से वो पंक्तियां याद आ रही हैं, ‘हम आपस में लड़ बैठे तो देश को कौन संभालेगा….’

Saturday, September 25, 2010

ये मीडिया किस देश की है???


लंबी कोशिशों के बाद हमें राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी मिली। मेजबानी के टाइम पर हर कोई भारत की इस जीत को लेकर बेकरार दिखाई दिया। दे भी क्यों न, आखिर हमने इतने देशों को पीछे छोड़कर कॉमनवेल्थ की मेजबानी अपनी झोली में जो डाली थी। अर्सा बीत गया, मीडिया को भी याद नहीं रहा। इस बीच जैसे ही इस महाआयोजन का समय नजदीक आया तो मीडिया भी इसमें खबरें तलाशने लगी। थोड़े दिनों के बाद हमारे काबिल पत्रकारों ने कड़वी सच्चाई भी सामने लानी शुरू कर दी। वक्त बीतता गया, हर दिन एक नई चौंकाने वाली खबर सामने आती गई। सरकार और उसके नुमाइंदे भी मीडिया की इस कसरत पर हिल गए। यहां तक की बात तो सही थी, लेकिन अब मीडिया इन मामलों और अपनी मसालेदार खबर तलाशने के चक्कर में यहां तक भूल गई कि यह हमारे देश की इज्जत है। इस आयोजन के न होने की परिस्थिति में उसी देश की किरकिरी होगी, जहां यह मीडिया अपने संस्थान चला रही है। मैं हालांकि मीडियाकर्मी होने के नाते अपने काबिल साथियों की बुराई बिल्कुल नहीं कर रहा हूं, लेकिन मेरा मानना है कि मीडिया को अब जब आयोजन अपने चरम पर है, नेगेटिविटी पैदा करने के बजाए कुछ पॉजिटीव बातें भी सामने लानी चाहिएं। इस आयोजन की महत्ता कितनी है, इसकी सबसे बेहतर नजीर है हाल में खेल गांव का दौरा करने आए फेनेल ने दौरे के बाद की प्रतिक्रिया पूरी तरह से पॉजिटीव दी। ऐसा नहीं है कि उन्होंने जमीनी सच्चाई नहीं देखी होगी, बल्कि इसके पीछे का सच यह है कि इस आयोजन को सफल बनाने में उनका एक बयान बहुत महत्ता रखता है। इसी दूरगामी सोच को मानते हुए उन्होंने आल इज वेल बोल डाला। अब अगर दूसरे देश से आए परदेसी इस आयोजन की महत्ता को समझ रहे हैं तो हमारी मीडिया इस कदर खबरची बनने पर क्यों लगी है। ठीक है, मैं एक पत्रकार हूं, या फिर लोगों तक सरकारी नाकामी का सच लाना मेरे लिए एक मुहिम है लेकिन यह भी तो सोचना होगा कि हम इसी देश के बाशिंदे हैं। हमारे देश की शान पर उंगली उठना हमारी शान पर उंगली उठने के बराबर है। अगर फेनेल एक बयान नकारात्मक दे देते तो राष्ट्रमंडल खेलों से मुंह मोडने को तैयार बैठे कई देश तुरंत भागीदारी करने से इंकार कर देते, लेकिन फेनेल की इस दूरदर्शी सोच को अब हमें मानना ही होगा। हमें समझना होगा कि अब हमें किसी भी तरह से इस आयोजन को सफल बनाने की कोशिश करनी है। मेरी सभी मीडियाकर्मियों से अपील है कि वह शेरा का सीना गर्व से चौड़ा कर दें, ताकि कल अतिथि देवो भवः के देश में आने वाले परदेसी यहां की तारीफ करके वापस जाएं।

जय हिंद...

Thursday, September 16, 2010

जब मुझे ही देनी पड़ी घूस...


ईद की छुटि्‌टयां मनाने के लिए घर पहुंचा। ईद खुशी के साथ मनाई लेकिन पास की कालोनी में भारी बरसात के पानी के विकराल रूप ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया। पता चला कि कालोनी में ड्रेनेज सिस्टम ठप हो चुका है। कई दिन तक पानी न निकलने की वजह से लोगों में आक्रोश फैल गया। लोगों ने सड़क जाम की तो नगर निगम को होश आया। टीम ने नाले की सफाई के लिए तीन जेसीबी मौके पर लगा दी। इस बीच मेरे घर के सामने से यह नाला गुजरने की वजह से पिताजी को रास्ता बंद होने का डर सताने लगा। टीम पूरे नाले की दोबारा खुदाई करवाते हुए जब हमारे घर के सामने पहुंची तो हमारी धड़कने बढ़ गई। इस बीच एक दरोगा जी हमारे पास आकर बैठ गए। इधर टीम की जेसीबी काम करने में लगी हुई थी तो उधर दरोगा जी मीठीमीठी बातें हमें एक दिलासा दे रहे थे। इस बीच मेरा भाई लगातार दरोगा जी के पास लगकर कुछ देने की कोशिश कर रहा था। इधर मैं अपने भाई की इस हरकत को नोटिस करने की कोशिश में लगा था तो दरोगा जी के साथ का पुलिसकर्मी अकड़ दिखाने लगा। पिताजी ने तुरंत मुझे मामले में आगे ला दिया। मैंने पूछा तो पुलिसकर्मी ने बताया कि नाले की खुदाई में घर से निकलने का रास्ता बचाने के लिए आपके पिताजी ने एक हजार रुपए का सौदा किया था, लेकिन अब पैसे देने के टाइम पर वह महज पांच सौ रुपए ही दे रहे हैं। अपनी आंखों के सामने यह घूसखोरी देखकर मेरे अंदर का पत्रकारी कीड़ा जाग गया। मामला बिगड़ता देख मीठीमीठी बातें कर रहे दरोगा जी भी वहां से कड़वा मूड लेकर चलते बने। मैं तुरंत दरोगा जी के पास पहुंचा तो उनका लहजा पैसे की वजह से बदल चुका था। दरोगा जी ने तुनकते हुए जवाब दिया कि आपके पिताजी ने रास्ता छुड़वाने के लिए पैसे की बात की थी लेकिन अब पैसे देने में आनाकानी कर रहे हैं। मेरे पूछे बिना पिताजी की यह हरकत पहले पहल तो मुझे नागवार गुजरी लेकिन इस बीच पैसे कम की बात पर अड़ने वाले पुलिसकर्मी बचाया हुआ रास्ता तोड़ने का दबाव बनाने लगे। अब रास्ता बचाने के लिए पैसे देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। मजबूरी में मुझे अपने हाथों से उन घूसखोर पुलिसकर्मियों को घूस के पैसे देने पड़े। लेकिन इस घूसखोरी का जरिया मैं और मेरा परिवार बना, यह कम से कम मेरे लिए तो बिल्कुल विचित्र और न लगने वाली बात थी। पिताजी ने घर से निकलने का रास्ता बचाने के लिए एक दरोगा को पैसे देने का कमिटमेंट कर लिया लेकिन इस कमिटमेंट ने मेरे लिए हजारों सवाल पैदा कर दिए। सबसे पहला सवाल तो यही था कि पुलिस की दागदार छवि आखिर कब धुलेगी? दूसरा सवाल ये था कि इस घूसखोरी के लिए जिम्मेदार कौन हैं? इन सवालों के जवाब भी मेरे और मेरे परिवार के इर्द गिर्द ही मिल सकते थे। अगर पिताजी अपना रास्ता बचाने के लिए पुलिसकर्मियों के पास बेबसी भरी गुहार न लगाते तो क्या यह दिन आता? काम नगर निगम की टीम कर रही है लेकिन व्यवस्था बनाने वाली पुलिस अपनी व्यवस्थाएं तलाश रही है तो यह सरकारी व्यवस्थाओं की नाकामी बताने के लिए काफी है। जब मौके पर नगर निगम का इंजीनियर मौजूद था तो ऐसी परिस्थिति क्यों आई कि पुलिस वाले पैसा खाने लगे? सवाल बहुत हैं, इनके जवाब भी हम खुद हैं लेकिन इस घूसखोरी का शिकार होना मेरे लिए ताउम्र न भूलने वाला दंश बन गया।

Friday, August 6, 2010

अच्छा हुआ मैं नेता नहीं हूं


बचपन से भले ही पढऩे में बहुत ज्यादा टेलेंटिड न रहा हूं लेकिन मैंने कभी नेता बनने की ख्वाहिश नहीं पाली. पालता भी क्यों, मुझे गरीबों के हिस्से का टुकड़ा छीनने में कभी कोई दिलचस्पी ही नहीं रही. आज जब मैं पत्रकारिता में अपना कॅरियर बनाने की ओर अग्रसर हूं तो मुझे यह सोचकर बहुत अच्छा महसूस होता है कि मैं नेता नहीं हूं. मैं वो नहीं हूं जो अपने देश की इज्जत ताक पर रखकर विदेशी बैंकों में काला धन जमा करूं. मैं वो भी नहीं हूं जो दूसरे की इज्जत को ठुकराकर आम जनता की इज्जत के साथ खिलवाड़ करूं. मैं वो नहीं हूं जो कि देश की जनता के वोट पर राजनीति कर सरकारी योजनाओं में घोटाला करूं. मैं वो नहीं हूं जो कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे सौभाग्यशाली मिले आयोजन में पैसा खाकर डकार भी न लूं. मैं ऐसा बनना भी नहीं चाहता. मैं लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का एक छोटा सा सेवक हूं. मैं यही बना रहना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि मेरे देश के नेता भी अपनी सोच में बदलाव लाएं.जनता के टैक्स और दूसरी तरह से जमा की गई रकम को अपने बाप का माल न समझें. मैं चाहता हूं कि मेरे देश का नेता अपनी तनख्वाह के दम पर राजनीति करे. वो चुनाव जीतने के बाद अपना बैंक बैलेंस बनाने के बजाए मेरे देश की भूखी प्यासी जनता की रक्षा करे और उनके हक को उन तक पहुंचाए. मैं चाहता हूं कि मेरे देश का नेता उन गांधीजी से कुछ प्रेरणा ले जिनके लिए देशसेवा एक धर्म था. मैं चाहता हूं कि मेरे मंत्रीजी अपने भत्ते और यात्रा खर्चों का इस्तेमाल उन इलाकों के लिए करें जहां मजबूरी की वजह से नक्सलवाद पैदा हो रहा है. उन भूखे इलाकों में जाएं जहां आज भी दो वक्त की रोटी नसीब में नहीं है. जिस टोन में ये वोट मांगते हैं उन्हीं वादों के साथ अपना पांच साल का टाइम पूरा करें. मैं चाहता हूं...लेकिन मेरे चाहने से कुछ नहीं होगा. कुछ होगा तो उन लोगों के चाहने से जो हर बार एक ही चुनाव चिन्ह को देखकर बटन दबा देते हैं. कुछ बदलाव होगा उन युवाओं से जो चाहते हुए भी राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं. कुछ होगा तो उन नेताओं की सोच बदलने से जो जनता को सिर्फ अपने हाथ की कठपुतली मानते हैं. फैसला आपके हाथ.

Monday, August 2, 2010

इन्हें तो बख्श दो


आज फिर मैंने महाराष्ट्र में राज ठाकरे की सेना का विरोध देखा। मीडिया और उत्तरी भारतीयों पर हमले के बाद अब यह हमला उन मासूमों की प्रतिभा पर था जो शायद सरहद के मायने भी नहीं समझते होंगे. कल की दुनिया का यह भविष्य अगर इस छिटपुन में ही सरहदों की दीवारों के बारे में समझ लेगा तो क्या कभी हमारे और पड़ोसी देश के बीच तालमेल बन सकेगा. पाकिस्तान के आतंकवाद ने हमारे देश को भले ही कितना भी नुकसान पहुंचाया हो लेकिन इसके लिए हम उन मासूमों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते, जिन्होंने अतिथि देवो भवः वाले देश में अपना टेलेंट दिखाने के लिए आसरा लिया है. उनके देश में नाच गाने को गलत माना जाता है तो उन्होंने अपनी प्रतिभा को एक मंच देने के लिए भारत का सहारा लिया. वैसे इसमें कोई बुराई भी नहीं होनी चाहिए. लेकिन कुछ लोग अपनी जबर्दस्ती और विरोध के लिए इन बच्चों को चुन रहे हैं तो यह मेरे ख्याल से तो गलत है. क्या जब इंडिया का कोई प्लेयर विदेशी धरती पर जाकर पदक जीतकर लाता है तो वहां उसका विरोध होता है. नहीं ना, क्योंकि वह प्लेयर तो सिर्फ अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए किसी प्रतियोगिता में जाता है. ऐसे तमाम मामले होंगे जब हम हिंदुस्तानियों को उनकी सरजमीं पर ही धूल चटाई है, इस पर गर्व भी किया है लेकिन अगर वह हमारा विरोध करते तो जो आनंद और गर्व के लम्हें हमें मिले हैं, क्या वो कभी मिल पाते? यह सोचना चाहिए उन लोगों को जो कि अपनी राज्यवादिता और देशभक्ति पर नाज करते हैं. यह समझना चाहिए उन लोगों को जो खुद को कानून से भी ऊपर मानते हुए पल भर में इसकी धज्जियां उड़ा देते हैं. यह जानना चाहिए उन लोगों को जो खुद को उस भारत माता का सच्चा देशभक्त मानते हैं, जिसके मूल में ही अतिथि को भगवान का दर्जा दिया गया है. बड़ा दुख होता है, यह देखकर कि जब कुछ लोगों की वजह से पूरा धर्म बदनाम हो जाता है. उनका धर्म तो बदनाम हो चुका है लेकिन अब ये खुरापाती लोग अपना धर्म क्यों बदनाम करने पर लगे हुए हैं? आज इस संस्कृति का लोहा पूरी दुनिया मानती है तो भला इन लोगों को क्या हक है इस देवसंस्कृति के नियमों के साथ खिलवाड़ करने का? मैं मानता हूं कि धर्म का नाम आते ही स्वाभाविक तौर पर कट्‌टरपंथ का भाव भी पैदा हो जाता है लेकिन यह कट्‌टरवादिता होनी चाहिए उस बुराई के लिए जिसकी वजह से हर साल न जाने कितनी महिलाएं शोषित हो जाती हैं, उन देवियों के लिए जो कि कुछ लोगों के लिए आज भी सिर्फ भोग विलास की वस्तु ही मानी जाती हैं. अगर ऐसे कुछ लोग अपनी बेवजह की बातें और विरोध करते रहेंगे तो फिर उनमें और हममें क्या फर्क रह जाएगा?