विचार कभी सामान्य नहीं होते

विचार तो मन में आते हैं लेकिन हम उन्हें सही दिशा नहीं दे पाते। अपनी आंखों के सामने हर पल कुछ नया देखते हैं लेकिन उसके बारे में सोच नहीं पाते, अगर सोचते हैं तो शब्दों में ढ़ालना मुश्किल है। शब्दों में ढ़ाल भी दें तो उसे मंच देना और भी मुश्किल है। यहां कुछ ऐसे ही विचार जो जरा हटकर हैं, जो देखने में सामान्य हैं लेकिन उनमें एक गहराई छिपी होती है। ऐसे पल जिन पर कई बार हमारी नजर ही नहीं जाती। अपने दिमाग में हर पल आने वाले ऐसे भिन्न विचारों को लेकर पेश है मेरा और आपका यह ब्लॉग....

आपका आकांक्षी....
आफताब अजमत



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Sunday, June 20, 2010

तब किसके हवाले वतन?


'हिम्मत वतन की हमसे है, ताकत वतन की हमसे है'


लेकिन यहां न तो हिम्मत देखने को मिल रही है और न ही ताकत। वजह युवाओं का आर्मी से दूर भागना या फिर यहां की मुश्किल जिंदगी. बात कुछ भी हो लेकिन यह एक सच है कि आज आर्मी को लेकर इतना ज्यादा क्रेज देखने को नहीं मिल रहा है. एक समय था जब हर घर से एक फौजी होने को गर्व की बात माना जाता था. इसकी हालांकि कई वजहें थी, जिसमें सबसे बड़ी वजह थी, बड़े परिवार. बड़े परिवार में अगर एक बेटा देश पर जान कुर्बान कर देता था तो इसे जहां एक ओर गर्व से जोडक़र देखा जाता था तो दूसरी ओर परिवार भी इस सदमें से आसानी से पार पा जाता था. लेकिन अब पर्रिस्थितियां काफी बदल गई हैं. अब देश पर मर मिटने की बातें, बातें ज्यादा लगती हैं. इसकी वजह से कई बार तो जैसे मुश्किल हालात बन जाते हैं. हालांकि आज भी यह सच्चाई है कि देश पर कुर्बान होने का जज्बा रखने वाले लोग आज भी अपने सपनों में अपने बेटों को मां को समर्पित होता ही देखना चाहते हैं लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि ऐसे लोगाों की संख्या काफी कम होती जा रही है.

इसकी वजह से जो सबसे बड़ी समस्या बनकर उभर रही है, वह है आर्मी में अधिकारियों की लगातार बढ़ती कमी. यहां आज भी चार्म की इस लाइफ को युवा अनुशासन की जिंदगी मानकर इससे किनारा कर रहे हैं. यह एक सच्चाई है कि युवा इससे किनारा कर रहे हैं लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि आर्मी का चयन की प्रक्रिया में आज भी वही मानक हैं, जबकि आज का युवा उन मानकों पर खरा उतरने में मुश्किलों का सामना करता है. करे भी क्यों न आखिर आज न तो वह ताजी हवा है, न ही सुबह उठकर नेचर का मजा लेने के वो पल. सबकुछ मशीन की तरह से बदल चुका है, हर जगह तेजी से बदलाव हो रहे हैं. अब अगर आपके पास सुबह घूमने का टाइम है तो सुबह की ताजी हवा गायब हो चुकी है, घर का दूध दही और मक्खन तो जैसे गायब ही हो चुके हैं. रंग बिरंगे कागजों और पालिथीन में लिपटा घी दूध जैसे शारीरिक नहीं मानसिक पूर्तिभर के लिए रह गया है. ऐसे में अगर हम युवाओं में ताकत की बात करें तो पहले की अपेक्षा यह काफी कम हो चुकी है. ऐसे में आर्मी को भी अपनी चयन प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन करने की दरकार है. हां यह बात सही है कि बहुत ज्यादा समझौता सही नहीं है लेकिन कुछ लचीलापन युवाओं को इस ओर एक बार फिर आकर्षित कर सकता है. कई बार तो मैं यह भी सोचता हूं कि अब से दस साल के बाद यह समस्या विकराल रूप ले लेगी. क्योंकि अब से दस साल बाद आने वाले युवा को अपनी प्रारंभिक पढ़ाई के दौरान ही कमाई में भी इंटरेस्ट होगा. ऐश परस्ती का जितनी तेजी से प्रचार व प्रसार हो रहा है, वह एक नए युग की ओर इशारा करता है, एक ऐसा युग जहां युवा सिर्फ खुद के लिए जिएगा, जहां मान मर्यादाओं की कोई सीमा नहीं रह जाएगी, ऐसे में भारत मां की रक्षा करने वालों की संख्याा कितनी होगी, कहना मुश्किल है?

Sunday, May 16, 2010

फिर जिंदा हो गई बहस


बात जब लिव इन रिलेशन की हो तो हर मन में एक अजीब सा सवाल पैदा होता है। सवाल होता है ये कि आखिर भारतीय संस्कृति के अनुसार क्या यह सही है? सवाल होता है कि क्या शादी से पहले किसी गैर मर्द को अपना सबकुछ सौंपना सही है? सवाल तो ये भी उठता है कि क्या शादी से पहले साथ रहने के बाद स्त्रीपुरुष में एकदूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान रह जाता है? इन सब सवालों से जूझने के बाद दक्षिण की अभिनेत्री खुश्बू को तो सुप्रीम कोर्ट ने राहत दे दी, लेकिन नई पीढ़ी इस नए रिश्ते में ही ज्यादा विश्वास करती है। इसका ताजा उदाहरण है शनिवार को राजधानी में देहरादून पहुंची मिस इंडिया वर्ल्ड२०१० मनस्वी ममंगाई। उन्होंने युवाओं और कन्याओं को अपना मैसेज देने के लिए आधुनिक सोच को ही सर्वोपरि रखा। उन्होंने लिव इन रिलेशन को लेकर सबसे पहले यही कहा कि आखिर क्यों हम किसी रिश्ते को खुद पर बोझ बनाएं। क्यों न हम एकदूसरे के साथ इस पवित्र बंधन में बंधने के लिए पहले कुछ दिनों एक दूसरे को जान लें। उन्होंने कहा कि इस रिश्ते को बनाए रखने के लिए ये भी जरूरी है कि आप सिर्फ सिनेमाघर या पार्क में बैठकर टाइम वेस्ट करने के बजाए कुछ दिनों तक साथ रहें। इससे आने वाला टाइम और मैरिज लाइफ ज्यादा बेस्ट हो सकती है। मनस्वी का यह बयान भले ही उन लोगों को सही न लगे जो खुद को आधुनिकता में नहीं ढ़ाल पाएं हों लेकिन ये तो सच है कि बदलते परिवेश में सोच को भी बदलना ही होगा। अगर हम समय रहते ऐसा कर पाएं तो हमारे और हमारे युवाओं के लिए ज्यादा बेहतर होगा। तो चलो, कदम से कदम मिलाकर चलें और विवादों से इतर देश के विकास की सोचें। अब अगर यह रिश्ता और रिश्तों की यह बदलती परिभाषा ही वर्तमान की मांग है तो हमें मिलकर इसे स्वीकार करना ही होगा। आज का युवा खुले विचारों वाला है तो उसे विचारों में जोश और जज्बा देखने के काबिल है। उसे जीवन साथी का चयन करनें में अब परंपरागत रवैयों से कोई मतलब नहीं है। यह बदलाव है इसे बदलाव को सहर्ष स्वीकार करें।

Saturday, May 8, 2010

आखिर क्या खता थी श्रुति की?

श्रुति घर से निकली तो रैली में भाग लेने के लिए थी लेकिन रन टू लिव की यह रैली उसके लिए रन टू डेथ बन गई. स्कूल ने अपने लेवल पर कुछ दिया तो यह कि उसकी फैमिली को एक ऐसा दर्द जिसके लिए वह हमेशा स्कूल को कोसते रहेंगे. चुलबुली सी दिखने वाली नन्हीं श्रुति देहरादून के एक स्कूल में ९वीं में पढती थी. उस सुबह श्रुति को स्कूल की एक रैली में हिस्सा लेना था, जिसके लिए वह अर्ली मॉर्निंग बिना कुछ खाए पीए ही घर से चली गई. घर के दरवाजे तक मां अपनी लाडली को कुछ खिलाने की बात कहती रही लेकिन श्रुति को लेट होने का डर सता रहा था. स्कूल से रैली सही टाइम पर शुरू हुई लेकिन हादसा तब हुआ जब रैली वापस लौट रही थी. कई हजार बच्चों की यह रैली रन टू लिव के नाम से आयोजित कराई जा रही थी. लेकिन एक लापरवाही ने इसे रन टू डेथ में बदल दिया. लापरवाही भी इस कदर कि मसूरी की ओर जाने वाले रास्ते पर एनआईवीएच के पास एक पेड़ कई दिन से धूधू कर जल रहा था. रैली से पहले की जाने वाली चेकिंग में यह पेड़ दिखाई भी दिया लेकिन फायर ब्रिगेड ने इसे हल्के में मानकर महज खानापूर्ति कर पानी डाल दिया। लेकिन यह लापरवाही बहुत महंगी साबित होने जा रही थी. जैसे ही बच्चों का झुंड उस पेड़ के पास पहुंचा तो जैसे विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा. कई दिनों से जल रहा यह पेड़ जैसे बच्चों का ही इंतजार कर रहा था. अचानक गिरा तो बच्चों में भगदड़ मच गई. जान बचाने को इधरउधर भ् ाागने लगे तो श्रुति ने अपनी जान पर खेलकर अपने फ्रेंड्‌स की जान क्या बचाई कि उसे इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. श्रुति के मित्रों का कहना है कि श्रुति तो बच गई थी लेकिन जब उसने देखा कि हम फंस रहे हैं तो उसने भागकर हमें धक्का दे दिया. इससे हम तो बच गए लेकिन श्रुति पेड़ का शिकार हो गई. अब सवाल ये है कि आखिर श्रुति की गलती क्या थी, उसे पैदा करने वालों की गलती क्या थी, श्रुति ने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए कई और घरों के चिरागों की रोशनी तो बचा ली लेकिन आज श्रुति का खुद का घर अंधेर हो गया. घर की इकलौती संतान श्रुति के न होने से जैसे परिजनों पर पहाड़ टूट पड़ा. इस पर चिंताजनक बात ये कि जिस स्कूल की मनमानी की वजह से श्रुति को मौत के रास्ते पर भेजा गया, उसके किसी भी स्टाफ का कोई भी शख्स श्रुति के परिजनों के आंसू पोंछने नहीं आया. श्रुति के पिता हालांकि आगे तक लड़ाई लडऩे की बात कह रहे हैं, लेकिन क्या आपको लगता है कि उन्हें न्याय मिल पाएगा? कोई उनके साथ उठने को तैयार नहीं है, क्या उनकी यह गलती है कि उन्होंने एक बेटी का जन्म दिया है, या फिर यह कि पब्लिक स्कूलों के सामने कोई और मां बाप मुंह खोलने की हिमाकत नहीं कर पाते. बात कुछ भी हो लेकिन प्रशासन और पब्लिक स्कूलों की वजह से एक घर का चिराग, उम्मीदें, रोशनी हमेशा के लिए कहीं खो गई.