
ईद की छुटि्टयां मनाने के लिए घर पहुंचा। ईद खुशी के साथ मनाई लेकिन पास की कालोनी में भारी बरसात के पानी के विकराल रूप ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया। पता चला कि कालोनी में ड्रेनेज सिस्टम ठप हो चुका है। कई दिन तक पानी न निकलने की वजह से लोगों में आक्रोश फैल गया। लोगों ने सड़क जाम की तो नगर निगम को होश आया। टीम ने नाले की सफाई के लिए तीन जेसीबी मौके पर लगा दी। इस बीच मेरे घर के सामने से यह नाला गुजरने की वजह से पिताजी को रास्ता बंद होने का डर सताने लगा। टीम पूरे नाले की दोबारा खुदाई करवाते हुए जब हमारे घर के सामने पहुंची तो हमारी धड़कने बढ़ गई। इस बीच एक दरोगा जी हमारे पास आकर बैठ गए। इधर टीम की जेसीबी काम करने में लगी हुई थी तो उधर दरोगा जी मीठीमीठी बातें हमें एक दिलासा दे रहे थे। इस बीच मेरा भाई लगातार दरोगा जी के पास लगकर कुछ देने की कोशिश कर रहा था। इधर मैं अपने भाई की इस हरकत को नोटिस करने की कोशिश में लगा था तो दरोगा जी के साथ का पुलिसकर्मी अकड़ दिखाने लगा। पिताजी ने तुरंत मुझे मामले में आगे ला दिया। मैंने पूछा तो पुलिसकर्मी ने बताया कि नाले की खुदाई में घर से निकलने का रास्ता बचाने के लिए आपके पिताजी ने एक हजार रुपए का सौदा किया था, लेकिन अब पैसे देने के टाइम पर वह महज पांच सौ रुपए ही दे रहे हैं। अपनी आंखों के सामने यह घूसखोरी देखकर मेरे अंदर का पत्रकारी कीड़ा जाग गया। मामला बिगड़ता देख मीठीमीठी बातें कर रहे दरोगा जी भी वहां से कड़वा मूड लेकर चलते बने। मैं तुरंत दरोगा जी के पास पहुंचा तो उनका लहजा पैसे की वजह से बदल चुका था। दरोगा जी ने तुनकते हुए जवाब दिया कि आपके पिताजी ने रास्ता छुड़वाने के लिए पैसे की बात की थी लेकिन अब पैसे देने में आनाकानी कर रहे हैं। मेरे पूछे बिना पिताजी की यह हरकत पहले पहल तो मुझे नागवार गुजरी लेकिन इस बीच पैसे कम की बात पर अड़ने वाले पुलिसकर्मी बचाया हुआ रास्ता तोड़ने का दबाव बनाने लगे। अब रास्ता बचाने के लिए पैसे देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। मजबूरी में मुझे अपने हाथों से उन घूसखोर पुलिसकर्मियों को घूस के पैसे देने पड़े। लेकिन इस घूसखोरी का जरिया मैं और मेरा परिवार बना, यह कम से कम मेरे लिए तो बिल्कुल विचित्र और न लगने वाली बात थी। पिताजी ने घर से निकलने का रास्ता बचाने के लिए एक दरोगा को पैसे देने का कमिटमेंट कर लिया लेकिन इस कमिटमेंट ने मेरे लिए हजारों सवाल पैदा कर दिए। सबसे पहला सवाल तो यही था कि पुलिस की दागदार छवि आखिर कब धुलेगी? दूसरा सवाल ये था कि इस घूसखोरी के लिए जिम्मेदार कौन हैं? इन सवालों के जवाब भी मेरे और मेरे परिवार के इर्द गिर्द ही मिल सकते थे। अगर पिताजी अपना रास्ता बचाने के लिए पुलिसकर्मियों के पास बेबसी भरी गुहार न लगाते तो क्या यह दिन आता? काम नगर निगम की टीम कर रही है लेकिन व्यवस्था बनाने वाली पुलिस अपनी व्यवस्थाएं तलाश रही है तो यह सरकारी व्यवस्थाओं की नाकामी बताने के लिए काफी है। जब मौके पर नगर निगम का इंजीनियर मौजूद था तो ऐसी परिस्थिति क्यों आई कि पुलिस वाले पैसा खाने लगे? सवाल बहुत हैं, इनके जवाब भी हम खुद हैं लेकिन इस घूसखोरी का शिकार होना मेरे लिए ताउम्र न भूलने वाला दंश बन गया।


