विचार कभी सामान्य नहीं होते

विचार तो मन में आते हैं लेकिन हम उन्हें सही दिशा नहीं दे पाते। अपनी आंखों के सामने हर पल कुछ नया देखते हैं लेकिन उसके बारे में सोच नहीं पाते, अगर सोचते हैं तो शब्दों में ढ़ालना मुश्किल है। शब्दों में ढ़ाल भी दें तो उसे मंच देना और भी मुश्किल है। यहां कुछ ऐसे ही विचार जो जरा हटकर हैं, जो देखने में सामान्य हैं लेकिन उनमें एक गहराई छिपी होती है। ऐसे पल जिन पर कई बार हमारी नजर ही नहीं जाती। अपने दिमाग में हर पल आने वाले ऐसे भिन्न विचारों को लेकर पेश है मेरा और आपका यह ब्लॉग....

आपका आकांक्षी....
आफताब अजमत



Thursday, September 16, 2010

जब मुझे ही देनी पड़ी घूस...


ईद की छुटि्‌टयां मनाने के लिए घर पहुंचा। ईद खुशी के साथ मनाई लेकिन पास की कालोनी में भारी बरसात के पानी के विकराल रूप ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया। पता चला कि कालोनी में ड्रेनेज सिस्टम ठप हो चुका है। कई दिन तक पानी न निकलने की वजह से लोगों में आक्रोश फैल गया। लोगों ने सड़क जाम की तो नगर निगम को होश आया। टीम ने नाले की सफाई के लिए तीन जेसीबी मौके पर लगा दी। इस बीच मेरे घर के सामने से यह नाला गुजरने की वजह से पिताजी को रास्ता बंद होने का डर सताने लगा। टीम पूरे नाले की दोबारा खुदाई करवाते हुए जब हमारे घर के सामने पहुंची तो हमारी धड़कने बढ़ गई। इस बीच एक दरोगा जी हमारे पास आकर बैठ गए। इधर टीम की जेसीबी काम करने में लगी हुई थी तो उधर दरोगा जी मीठीमीठी बातें हमें एक दिलासा दे रहे थे। इस बीच मेरा भाई लगातार दरोगा जी के पास लगकर कुछ देने की कोशिश कर रहा था। इधर मैं अपने भाई की इस हरकत को नोटिस करने की कोशिश में लगा था तो दरोगा जी के साथ का पुलिसकर्मी अकड़ दिखाने लगा। पिताजी ने तुरंत मुझे मामले में आगे ला दिया। मैंने पूछा तो पुलिसकर्मी ने बताया कि नाले की खुदाई में घर से निकलने का रास्ता बचाने के लिए आपके पिताजी ने एक हजार रुपए का सौदा किया था, लेकिन अब पैसे देने के टाइम पर वह महज पांच सौ रुपए ही दे रहे हैं। अपनी आंखों के सामने यह घूसखोरी देखकर मेरे अंदर का पत्रकारी कीड़ा जाग गया। मामला बिगड़ता देख मीठीमीठी बातें कर रहे दरोगा जी भी वहां से कड़वा मूड लेकर चलते बने। मैं तुरंत दरोगा जी के पास पहुंचा तो उनका लहजा पैसे की वजह से बदल चुका था। दरोगा जी ने तुनकते हुए जवाब दिया कि आपके पिताजी ने रास्ता छुड़वाने के लिए पैसे की बात की थी लेकिन अब पैसे देने में आनाकानी कर रहे हैं। मेरे पूछे बिना पिताजी की यह हरकत पहले पहल तो मुझे नागवार गुजरी लेकिन इस बीच पैसे कम की बात पर अड़ने वाले पुलिसकर्मी बचाया हुआ रास्ता तोड़ने का दबाव बनाने लगे। अब रास्ता बचाने के लिए पैसे देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। मजबूरी में मुझे अपने हाथों से उन घूसखोर पुलिसकर्मियों को घूस के पैसे देने पड़े। लेकिन इस घूसखोरी का जरिया मैं और मेरा परिवार बना, यह कम से कम मेरे लिए तो बिल्कुल विचित्र और न लगने वाली बात थी। पिताजी ने घर से निकलने का रास्ता बचाने के लिए एक दरोगा को पैसे देने का कमिटमेंट कर लिया लेकिन इस कमिटमेंट ने मेरे लिए हजारों सवाल पैदा कर दिए। सबसे पहला सवाल तो यही था कि पुलिस की दागदार छवि आखिर कब धुलेगी? दूसरा सवाल ये था कि इस घूसखोरी के लिए जिम्मेदार कौन हैं? इन सवालों के जवाब भी मेरे और मेरे परिवार के इर्द गिर्द ही मिल सकते थे। अगर पिताजी अपना रास्ता बचाने के लिए पुलिसकर्मियों के पास बेबसी भरी गुहार न लगाते तो क्या यह दिन आता? काम नगर निगम की टीम कर रही है लेकिन व्यवस्था बनाने वाली पुलिस अपनी व्यवस्थाएं तलाश रही है तो यह सरकारी व्यवस्थाओं की नाकामी बताने के लिए काफी है। जब मौके पर नगर निगम का इंजीनियर मौजूद था तो ऐसी परिस्थिति क्यों आई कि पुलिस वाले पैसा खाने लगे? सवाल बहुत हैं, इनके जवाब भी हम खुद हैं लेकिन इस घूसखोरी का शिकार होना मेरे लिए ताउम्र न भूलने वाला दंश बन गया।

Friday, August 6, 2010

अच्छा हुआ मैं नेता नहीं हूं


बचपन से भले ही पढऩे में बहुत ज्यादा टेलेंटिड न रहा हूं लेकिन मैंने कभी नेता बनने की ख्वाहिश नहीं पाली. पालता भी क्यों, मुझे गरीबों के हिस्से का टुकड़ा छीनने में कभी कोई दिलचस्पी ही नहीं रही. आज जब मैं पत्रकारिता में अपना कॅरियर बनाने की ओर अग्रसर हूं तो मुझे यह सोचकर बहुत अच्छा महसूस होता है कि मैं नेता नहीं हूं. मैं वो नहीं हूं जो अपने देश की इज्जत ताक पर रखकर विदेशी बैंकों में काला धन जमा करूं. मैं वो भी नहीं हूं जो दूसरे की इज्जत को ठुकराकर आम जनता की इज्जत के साथ खिलवाड़ करूं. मैं वो नहीं हूं जो कि देश की जनता के वोट पर राजनीति कर सरकारी योजनाओं में घोटाला करूं. मैं वो नहीं हूं जो कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे सौभाग्यशाली मिले आयोजन में पैसा खाकर डकार भी न लूं. मैं ऐसा बनना भी नहीं चाहता. मैं लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का एक छोटा सा सेवक हूं. मैं यही बना रहना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि मेरे देश के नेता भी अपनी सोच में बदलाव लाएं.जनता के टैक्स और दूसरी तरह से जमा की गई रकम को अपने बाप का माल न समझें. मैं चाहता हूं कि मेरे देश का नेता अपनी तनख्वाह के दम पर राजनीति करे. वो चुनाव जीतने के बाद अपना बैंक बैलेंस बनाने के बजाए मेरे देश की भूखी प्यासी जनता की रक्षा करे और उनके हक को उन तक पहुंचाए. मैं चाहता हूं कि मेरे देश का नेता उन गांधीजी से कुछ प्रेरणा ले जिनके लिए देशसेवा एक धर्म था. मैं चाहता हूं कि मेरे मंत्रीजी अपने भत्ते और यात्रा खर्चों का इस्तेमाल उन इलाकों के लिए करें जहां मजबूरी की वजह से नक्सलवाद पैदा हो रहा है. उन भूखे इलाकों में जाएं जहां आज भी दो वक्त की रोटी नसीब में नहीं है. जिस टोन में ये वोट मांगते हैं उन्हीं वादों के साथ अपना पांच साल का टाइम पूरा करें. मैं चाहता हूं...लेकिन मेरे चाहने से कुछ नहीं होगा. कुछ होगा तो उन लोगों के चाहने से जो हर बार एक ही चुनाव चिन्ह को देखकर बटन दबा देते हैं. कुछ बदलाव होगा उन युवाओं से जो चाहते हुए भी राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं. कुछ होगा तो उन नेताओं की सोच बदलने से जो जनता को सिर्फ अपने हाथ की कठपुतली मानते हैं. फैसला आपके हाथ.

Monday, August 2, 2010

इन्हें तो बख्श दो


आज फिर मैंने महाराष्ट्र में राज ठाकरे की सेना का विरोध देखा। मीडिया और उत्तरी भारतीयों पर हमले के बाद अब यह हमला उन मासूमों की प्रतिभा पर था जो शायद सरहद के मायने भी नहीं समझते होंगे. कल की दुनिया का यह भविष्य अगर इस छिटपुन में ही सरहदों की दीवारों के बारे में समझ लेगा तो क्या कभी हमारे और पड़ोसी देश के बीच तालमेल बन सकेगा. पाकिस्तान के आतंकवाद ने हमारे देश को भले ही कितना भी नुकसान पहुंचाया हो लेकिन इसके लिए हम उन मासूमों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते, जिन्होंने अतिथि देवो भवः वाले देश में अपना टेलेंट दिखाने के लिए आसरा लिया है. उनके देश में नाच गाने को गलत माना जाता है तो उन्होंने अपनी प्रतिभा को एक मंच देने के लिए भारत का सहारा लिया. वैसे इसमें कोई बुराई भी नहीं होनी चाहिए. लेकिन कुछ लोग अपनी जबर्दस्ती और विरोध के लिए इन बच्चों को चुन रहे हैं तो यह मेरे ख्याल से तो गलत है. क्या जब इंडिया का कोई प्लेयर विदेशी धरती पर जाकर पदक जीतकर लाता है तो वहां उसका विरोध होता है. नहीं ना, क्योंकि वह प्लेयर तो सिर्फ अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए किसी प्रतियोगिता में जाता है. ऐसे तमाम मामले होंगे जब हम हिंदुस्तानियों को उनकी सरजमीं पर ही धूल चटाई है, इस पर गर्व भी किया है लेकिन अगर वह हमारा विरोध करते तो जो आनंद और गर्व के लम्हें हमें मिले हैं, क्या वो कभी मिल पाते? यह सोचना चाहिए उन लोगों को जो कि अपनी राज्यवादिता और देशभक्ति पर नाज करते हैं. यह समझना चाहिए उन लोगों को जो खुद को कानून से भी ऊपर मानते हुए पल भर में इसकी धज्जियां उड़ा देते हैं. यह जानना चाहिए उन लोगों को जो खुद को उस भारत माता का सच्चा देशभक्त मानते हैं, जिसके मूल में ही अतिथि को भगवान का दर्जा दिया गया है. बड़ा दुख होता है, यह देखकर कि जब कुछ लोगों की वजह से पूरा धर्म बदनाम हो जाता है. उनका धर्म तो बदनाम हो चुका है लेकिन अब ये खुरापाती लोग अपना धर्म क्यों बदनाम करने पर लगे हुए हैं? आज इस संस्कृति का लोहा पूरी दुनिया मानती है तो भला इन लोगों को क्या हक है इस देवसंस्कृति के नियमों के साथ खिलवाड़ करने का? मैं मानता हूं कि धर्म का नाम आते ही स्वाभाविक तौर पर कट्‌टरपंथ का भाव भी पैदा हो जाता है लेकिन यह कट्‌टरवादिता होनी चाहिए उस बुराई के लिए जिसकी वजह से हर साल न जाने कितनी महिलाएं शोषित हो जाती हैं, उन देवियों के लिए जो कि कुछ लोगों के लिए आज भी सिर्फ भोग विलास की वस्तु ही मानी जाती हैं. अगर ऐसे कुछ लोग अपनी बेवजह की बातें और विरोध करते रहेंगे तो फिर उनमें और हममें क्या फर्क रह जाएगा?

Saturday, July 17, 2010

ठेका शादियों का

लगता है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने शादियों का ठेका ले लिया है। शिल्पा शेट्‌टी की शादी के बाद से यह प्रथा चली है तो बिना शादी की खबरों के चैनल भी सूने से लगते हैं। ऑफिस में काम कर रहा था कि अचानक स्टार न्यूज पर शादियों का एक गाना बजने लगा। अचानक से मेरी नजरें स्टार न्यूज की ओर पड़ी तो मैं चौंक गया। इस बार फिर एक शादी का आयोजन स्टार न्यूज की ओर से ब्रॉडकास्ट किया जा रहा था। उत्सुकता हुई तो मैंने अपनी नजरें टीवी चैनल पर गड़ा दी। अगले ही पल का माजरा देखकर मुझे हंसी और चिंता दोनो ही हुई। सवाल था कि न्यूज कंटेट और न्यूज का कांसेप्ट किस दिशा में जा रहा है। दरअसल चैनल जिस शादी की फुटेज शादी के गीतों के साथ दर्शकों को परोस रहा था, वह वडोदरा में हो रही किसी आम शादी की थी। इस खबर में दिखाया जा रहा था कि एक कुत्ता अपनी इंसान बहन की शादी कर रहा है। यह कुत्ता कितना संवेदना वाला है कि शादी में वह खुद ही कन्यादान भी कर रहा था। शादी की तैयारियों के मद्‌देनजर इस दौरान टीवी चैनल की ओर से कुत्ते को बारबार कन्या का भाई बताकर भाईबहन की जुदाई के गीत माहौल को गमगीन बना रहे थे। यह शादी और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का इस खबर को प्रमुखता से चलाना, मीडिया और खबरों की एक नई दिशा की ओर इशारा करता है। इसे देखने पर लगता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने तो शादियों का ठेका ही ले लिया है। यह ट्रेंड शुरू हुआ शिल्पा शेट्‌टी की शादी से तो सानिया मिर्जा से लेकर धोनी तक की शादियों में मीडिया बिन बुलाए मेहमान बनकर अपने दर्शकों के लिए हर नए एंगल पर खबर दिखाते रहे। शादियों को खबर बनाकर दिखाने का यह ट्रेंड भले ही पुराना हो लेकिन शादी में कुत्ते को भाई बनाकर विदाई लेने वाली खबरें अपने आप में एक नई दिशा की ओर इशारा करता है। मीडिया की उस दिशा की ओर जो कि भटकती दिखाई दे रही है। बात कुछ भी हो लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का शादियां कराने का यह ठेका जरा हजम नहीं होता।

Wednesday, July 7, 2010

मैं और रेनकोट

कुछ दिनों के इंतजार के बाद आखिर मानसून ने देहरादून में भी दस्तक दे ही दी। पहले की एक दो बारिश में तो मैंने खूब एन्जॉय किया, लेकिन अब जब मानसून जवान होता दिखाई दे रहा है तो मेरी परेशानी बढ़ती ही जा रही है। हर साल की तरह इस साल भी मैंने एक रेनकोट खरीदने का मन बनाया। सडक़ पर भरी बारिश में रिपोर्टिंग के लिए निकलता तो रेनकोट और छाता लिए लोग जैसे मुझे मुंह चिढ़ाते। एक दिन बारिश के पानी में सराबोर जब मैं ऑफिस पहुंचा तो खुद को लज्जा का अनुभव हुआ, क्योंकि दूसरे साथी रेनकोट होने की वजह से पानी के प्रकोप से काफी हद तक बच गए थे। बारिश की चर्चा चली तो सबकी नजर मेरे भीगे हुए कपड़ों पर गई। एक साथी ने तो रेनकोट लेने की सलाह भी दे डाली। अभी फिर से मेरे रेनकोट लेने के विचार को चार पंख लगे ही थे कि मेरे साथी फोटोग्राफर अरुण सिंह ने मार्केट के बजाए कैंटीन से किसी परिचित से रेनकोट मंगाने की बात कहकर इस जोश पर फिर ब्रेक सा लगा दिया। मैंने तुरंत ही मार्केट से रेनकोट खरीदने का प्लान त्याग दिया। कैंटीन से रेनकोट तो नहीं आ पाया, सुबह एक बार फिर मानसून मेरा भीगने के लिए स्वागत कर रहा था। एक बार फिर मुझे बारिश में नहाते हुए ही ऑफिस पहंचुना पड़ाा। लेकिन इस बार मैंने मार्केट से रेनकोट खरीदने का पूरा इरादा कर ही लिया था। मन में मार्केट से खरीदे जाने वाले रेनकोट की कल्पना भी कर ली थी, कि शाम को इसी कल्पना के साथ मैं बिना रेनकोट के ही ऑफिस पहुंचा। थोड़ी देर के बाद मेरे एक साथी ने रेनकोट पहने हुए ऑफिस में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई तो मेरा रेनकोट खरीदने का निश्चय उन्हें देखकर और प्रबल हो गया। लेकिन जैसे ही उन्होंने रेनकोट अपने शरीर से उतारा तो उनके कपड़े आंशिक रूप से पानी से सराबोर थे। रेनकोट को लेकर पहले से ही बेकरार मैं पहुंच गया अपने रेनकोटी साथी के पास। पहले तो मैंने हाथ से छूकर उसका रेट पूछा तो महज डेढ़ सौ रुपए कीमत ने मेरे रेनकोट खरीदने के इरादे को और पक्का कर दिया। लेकिन जब मेरी निगाह उनके भीगे हुए कपड़ो पर गई तो एक बार फिर मेरे रेनकोट खरीदने के हौंसले पस्त होने लगे. साथ में बैठे कुछ और साथियों में चर्चा करते हुए कहा कि रेनकोट होने के बावजूद कपड़े भीग जाते हैं साथ ही अचानक मौसम सही हो जाने पर रेनकोट को ढ़ोना भी पड़ता है। साथियों की यह बात मेरे दिमाग में बैठ गई और एक बार फिर मैंने खुद को मानसून की इस बारिश के हवाले कर दिया। इस तरह मैं रेनकोट तो खरीद नहीं सका लेकिन रेनकोट के बारे में काफी कुछ जान गया।

Monday, July 5, 2010

सब मार्केट वैल्यू की बात है जनाब

माही और साक्षी के अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेने की खबर जैसे ही हवा में फैली तो जैसे पूरी मीडिया का रुझान इसी ओर चला गया। कई दिनों से बीजेपी का भारत बंद दो दिन पहले अचानक टीवी चैनलों से गायब हो गया। एक मीडियापर्सन होने के नाते मैं धोनी के विवाह समारोह का बाहर से भी साक्षी तो नहीं बन पाया लेकिन अपने पड़ोस से लेकर तमाम मिलनेजुलने वालों का एक ही सवाल बारबार मुझे इस इंटरनेशनल घटनाक्रम को याद दिलाता। अलस्सुबह घर से दूध लेने के लिए निकला तो रास्ते में रावत जी मिल गए। खबरों से विशेष प्रेम रखने वाले रावत जी ने मिलते ही पहला सवाल दागा कि जब धोनी मीडिया को बुलाना ही नहीं चाहता तो आखिर आप मीडिया वाले उसके पीछे क्यों पड़े रहते हैं? रावत जी के इस सवाल को मैं तुरंत तो कोई जवाब नहीं दे पाया लेकिन इस सवाल ने मुझे सवालों में ला खड़ा किया। घर वापस आकर मैंने चाय की चुस्कियों के साथ रावत जी के सवाल का जवाब तलाशना शुरू किया। दिनभर मैं टीवी चैनलों पर धोनी और साक्षी की सगाई से लेकर शादी तक की तमाम खबरें देखता रहा और मेरी यह सोच और गहरी होती गई। दिल्ली से आई पूरी मीडिया ने इस मामले को महज कुछ ही घंटो में लाइव दिखाकर सबकी आंखों में उतार दिया। बीवी के कड़े विरोध के बावजूद मेरी निगाहें टीवी चैनल से और हाथ रिमोट से नहीं हट पा रहा था। काफी देर का टीवी ड्रामा देखने के बाद मेरा जो निष्कर्ष आया, वह आज की कड़वी सच्चाई है। हर शख्स मीडिया की आलोचना कर रहा था कि आखिर मीडिया इतना हाईप क्यों दे रहा है लेकिन साथ ही उनकी निगाहें भी पलपल कोई नई खबर तलाश रही थी।अब अगर कोई एक चैनल या अखबार इस खबर पर लगाम लगाता या न छापता तो उसकी मार्केट वैल्यू क्या होती? क्या कोई उस चैनल को इन खास पलों में देखना पसंद करता? क्या कोई भी रीडर चाहता कि उनके पसंदीदा अखबार में माही और उसकी हमसफर की फोटो या खबर न हो? क्या कोई भी आम आदमी ऐसा है जिसने यह खबर देखी, सुनी या पढ़ी न हो? निश्चित तौर पर आपका जवाब भी ना में ही आएगा। यही तो जवाब है रावत जी के सवाल का, उस सवाल को जो उन्होंने सुबह उठते ही मुझ पर दाग दिया था। अब मेरी समझ में आया कि यह सब मार्केट वैल्यू का सवाल है और अपने रीडर्स को रिझाए रखने का मामला है।

Sunday, June 20, 2010

तब किसके हवाले वतन?


'हिम्मत वतन की हमसे है, ताकत वतन की हमसे है'


लेकिन यहां न तो हिम्मत देखने को मिल रही है और न ही ताकत। वजह युवाओं का आर्मी से दूर भागना या फिर यहां की मुश्किल जिंदगी. बात कुछ भी हो लेकिन यह एक सच है कि आज आर्मी को लेकर इतना ज्यादा क्रेज देखने को नहीं मिल रहा है. एक समय था जब हर घर से एक फौजी होने को गर्व की बात माना जाता था. इसकी हालांकि कई वजहें थी, जिसमें सबसे बड़ी वजह थी, बड़े परिवार. बड़े परिवार में अगर एक बेटा देश पर जान कुर्बान कर देता था तो इसे जहां एक ओर गर्व से जोडक़र देखा जाता था तो दूसरी ओर परिवार भी इस सदमें से आसानी से पार पा जाता था. लेकिन अब पर्रिस्थितियां काफी बदल गई हैं. अब देश पर मर मिटने की बातें, बातें ज्यादा लगती हैं. इसकी वजह से कई बार तो जैसे मुश्किल हालात बन जाते हैं. हालांकि आज भी यह सच्चाई है कि देश पर कुर्बान होने का जज्बा रखने वाले लोग आज भी अपने सपनों में अपने बेटों को मां को समर्पित होता ही देखना चाहते हैं लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि ऐसे लोगाों की संख्या काफी कम होती जा रही है.

इसकी वजह से जो सबसे बड़ी समस्या बनकर उभर रही है, वह है आर्मी में अधिकारियों की लगातार बढ़ती कमी. यहां आज भी चार्म की इस लाइफ को युवा अनुशासन की जिंदगी मानकर इससे किनारा कर रहे हैं. यह एक सच्चाई है कि युवा इससे किनारा कर रहे हैं लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि आर्मी का चयन की प्रक्रिया में आज भी वही मानक हैं, जबकि आज का युवा उन मानकों पर खरा उतरने में मुश्किलों का सामना करता है. करे भी क्यों न आखिर आज न तो वह ताजी हवा है, न ही सुबह उठकर नेचर का मजा लेने के वो पल. सबकुछ मशीन की तरह से बदल चुका है, हर जगह तेजी से बदलाव हो रहे हैं. अब अगर आपके पास सुबह घूमने का टाइम है तो सुबह की ताजी हवा गायब हो चुकी है, घर का दूध दही और मक्खन तो जैसे गायब ही हो चुके हैं. रंग बिरंगे कागजों और पालिथीन में लिपटा घी दूध जैसे शारीरिक नहीं मानसिक पूर्तिभर के लिए रह गया है. ऐसे में अगर हम युवाओं में ताकत की बात करें तो पहले की अपेक्षा यह काफी कम हो चुकी है. ऐसे में आर्मी को भी अपनी चयन प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन करने की दरकार है. हां यह बात सही है कि बहुत ज्यादा समझौता सही नहीं है लेकिन कुछ लचीलापन युवाओं को इस ओर एक बार फिर आकर्षित कर सकता है. कई बार तो मैं यह भी सोचता हूं कि अब से दस साल के बाद यह समस्या विकराल रूप ले लेगी. क्योंकि अब से दस साल बाद आने वाले युवा को अपनी प्रारंभिक पढ़ाई के दौरान ही कमाई में भी इंटरेस्ट होगा. ऐश परस्ती का जितनी तेजी से प्रचार व प्रसार हो रहा है, वह एक नए युग की ओर इशारा करता है, एक ऐसा युग जहां युवा सिर्फ खुद के लिए जिएगा, जहां मान मर्यादाओं की कोई सीमा नहीं रह जाएगी, ऐसे में भारत मां की रक्षा करने वालों की संख्याा कितनी होगी, कहना मुश्किल है?